राजसमंद: राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गांव रक्षाबंधन को अनोखे अंदाज में मनाने के लिए जाना जाता है. यहां बेटियां पेड़ों को भाई मानकर उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी रक्षा का संकल्प लेती हैं. इस परंपरा के पीछे पर्यावरण बचाने और बेटियों के सम्मान की सोच जुड़ी है. गांव में बेटी के जन्म पर पौधे लगाने की परंपरा शुरू हुई, जिसने धीरे-धीरे पूरे गांव की पहचान बदल दी और लोगों को प्रकृति से जोड़ा. रक्षाबंधन का त्योहार आमतौर पर भाई-बहन के रिश्ते और रक्षा के संकल्प से जुड़ा होता है. लेकिन राजस्थान के पिपलांत्री गांव में इस पर्व का अर्थ इससे कहीं आगे बढ़ जाता है. यहां बेटियां और महिलाएं पेड़ों को राखी बांधकर केवल त्योहार नहीं मनातीं, बल्कि पौधों की देखभाल और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प भी लेती हैं.
पिपलांत्री में पर्यावरण संरक्षण की यह कहानी करीब दो दशक पुरानी है. गांव में बेटी के जन्म को खुशी का अवसर मानते हुए उसके नाम पर पौधे लगाने की परंपरा शुरू की गई. एक बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाने की परंपरा ने धीरे-धीरे पूरे गांव को हरियाली से जोड़ दिया. पौधा उस बेटी के साथ बड़ा होता है और उसके जीवन की याद से जुड़ा रहता है.
इस गांव की सबसे खास बात यह है कि बेटियां बड़ी होने के बाद उन्हीं पेड़ों को राखी बांधती हैं, जो उनके जन्म के समय लगाए गए थे. पेड़ उनके लिए केवल पौधा नहीं रहता, बल्कि परिवार के सदस्य जैसा बन जाता है. राखी बांधते समय बेटियां उसकी रक्षा करने और उसे जीवित रखने का संकल्प लेती हैं.
पिपलांत्री में पर्यावरण संरक्षण की मुहिम शुरू करने का श्रेय पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल को दिया जाता है. बताया जाता है कि बेटी के निधन के बाद उन्होंने उसकी याद में एक पौधा लगाया था. धीरे-धीरे उन्होंने पौधारोपण को गांव की सामूहिक मुहिम बना दिया. इसके बाद बेटी के जन्म को पौधारोपण से जोड़ने की परंपरा ने गांव में जड़ें जमा लीं.
पिपलांत्री की इस परंपरा में रक्षाबंधन केवल रस्म नहीं है. इसके साथ पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है.
पिपलांत्री की पहचान अब केवल एक सामान्य गांव के तौर पर नहीं होती. यहां बेटियों के सम्मान और पेड़ों की रक्षा को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है. गांव में महिलाओं और बालिकाओं की भागीदारी ने इस अभियान को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया. रक्षाबंधन के दौरान पौधारोपण और पेड़ों को राखी बांधने का दृश्य इस अनोखी परंपरा को और खास बना देता है.
पिपलांत्री की कहानी यह बताती है कि पर्यावरण बचाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. किसी गांव की छोटी सी पहल भी लंबे समय में बड़ा बदलाव ला सकती है. बेटी के जन्म, पेड़ और रक्षाबंधन को जोड़कर यहां एक ऐसा संदेश तैयार हुआ है, जिसमें प्रकृति और इंसान के रिश्ते को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है. यही वजह है कि पिपलांत्री की यह अनोखी परंपरा देशभर में चर्चा का विषय बनी.