मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के घने जंगलों में एक ऐसी संरचना सामने आई है, जिसने पुरातत्व और भूविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है. मंदिर जैसी दिखाई देने वाली इस जगह पर एक अनोखा पत्थर मौजूद है, जिसकी पूजा बैगा जनजाति के लोग लंबे समय से करते आ रहे हैं.
मध्य प्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार और संग्रहालय निदेशालय की टीम ने जब इस संरचना की तस्वीरें देखीं तो इसकी परतदार और मूंगे जैसी बनावट ने विशेषज्ञों के मन में कई सवाल खड़े किए. मौके पर पहुंचकर जांच और विभिन्न परीक्षण किए गए. इसके बाद इसके प्राचीन जीवाश्म होने की संभावना सामने आई.
विशेषज्ञों के अनुसार यह संरचना करीब 6.5 करोड़ साल पुरानी हो सकती है. यह वह दौर था जब पृथ्वी पर डायनासोर का प्रभुत्व अपने अंतिम चरण में था. उत्तरी अमेरिका में टी-रेक्स जैसे विशाल शिकारी जीव मौजूद थे, जबकि भारत के ज्वालामुखीय दक्कन क्षेत्र में राजासॉरस नर्मदेन्सिस जैसे डायनासोर पाए जाते थे. करीब 6.5 करोड़ साल पहले मेक्सिको के युकाटन क्षेत्र में एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने से पृथ्वी के पर्यावरण में भारी बदलाव आया. इसके साथ भारत में व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियां भी हुईं. माना जाता है कि इस दौर में धरती की करीब तीन चौथाई जीव प्रजातियां समाप्त हो गईं और डायनासोर का युग खत्म हो गया.
पुरातत्वविद डॉ. मनोज कुमार कुर्मी के अनुसार इस पत्थर से जुड़ी परंपरा संभवत: 8,000 से 10,000 साल पुरानी हो सकती है. उनका मानना है कि उस समय आज की तरह मंदिरों का निर्माण नहीं होता था. लोग पत्थर, पेड़, पहाड़ और प्रकृति की दूसरी चीजों को पवित्र मानकर उनकी पूजा करते थे. संभव है कि बाद में इसी पवित्र स्थल को मंदिर जैसा रूप दिया गया हो.
डिंडोरी बैगा समुदाय की पारंपरिक भूमि मानी जाती है. यहां जंगल उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. जंगल उन्हें भोजन, औषधि और रोजगार देने के साथ पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक जानकारी को भी संरक्षित रखते हैं. डिंडोरी में काम करने वाली गायनेकोलॉजिस्ट प्रियंका घोष के अनुसार यह इलाका मानव-विज्ञान और पुरातत्व की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. घोडामाडा की गुफाओं में पाषाण युग से जुड़े शैल आश्रयों के दस्तावेजीकरण में भी काम हो चुका है.