'बच्चा खतरे में है पैसे भेजो...', डॉक्टर बनकर करता रहा वसूली; भोपाल में अस्पताल के अंदर चल रही ठगी भंडाफोड़
भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जहां खुद को डॉक्टर बताकर जालसाज ने मरीजों के परिजनों से पैसे ऐंठे. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और अस्पताल कर्मचारियों की भूमिका की जांच जारी है.
भोपाल की राजधानी में स्थित हमीदिया अस्पताल से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने मरीजों और उनके परिजनों के भरोसे को झकझोर कर रख दिया है. इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे लोगों को डर दिखाकर उनसे पैसे वसूलने का एक खेल लंबे समय से चल रहा था. इस फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड जितेंद्र खगरे नाम का एक व्यक्ति बताया जा रहा है, जो खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों के परिजनों को फोन करता था और गंभीर हालत का हवाला देकर तुरंत पैसे भेजने को कहता था.
जांच में सामने आया है कि जालसाज को अस्पताल के अंदर से पूरी जानकारी मिलती थी. मरीज किस वार्ड में भर्ती है, उसकी बीमारी क्या है, परिजनों के मोबाइल नंबर और घर का पता तक उसे पहले से पता होता था. इसके बदले में अस्पताल के कुछ कर्मचारी उसे हर ठगी की रकम का हिस्सा देते थे. बताया जा रहा है कि कर्मचारियों को करीब 20 प्रतिशत कमीशन दिया जाता था. जनवरी से अब तक कम से कम दस परिवारों को इस गिरोह ने अपना शिकार बनाया है.
मजबूरी और डर का उठाया फायदा
जालसाज मरीज के परिजनों को फोन करके कहता था कि मरीज की हालत बेहद नाजुक है. अगर तुरंत जांच या दवा नहीं कराई गई तो जान को खतरा हो सकता है. इसके बाद वह क्यूआर कोड भेजकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने को कहता था. घबराए हुए परिजन बिना ज्यादा सोचे समझे पैसे भेज देते थे. एक पीड़ित ने बताया कि उसके बच्चे के दिल में छेद था और वह अस्पताल में भर्ती था. जालसाज ने खुद को डॉक्टर बताकर अस्पताल के अंदर भी उससे मुलाकात की और भरोसा जीत लिया.
ऑडियो रिकॉर्डिंग से खुली पोल
पुलिस के हाथ एक ऑडियो रिकॉर्डिंग भी लगी है, जिसमें आरोपी कहता सुनाई देता है कि दस हजार रुपये दे दो, मैं तुरंत जांच करवा दूंगा. उसने यह भी कहा कि अगर पैसे समय पर नहीं मिले तो हालत बिगड़ सकती है. वहीं दूसरी कॉल में आरोपी ने सीधे कहा कि मां और बच्चा दोनों खतरे में हैं और तुरंत पैसे भेजो. डर के मारे कई परिवारों ने हजारों रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए.
परिजनों का कहना है कि जैसे ही पैसे ट्रांसफर होते थे, आरोपी का फोन बंद हो जाता था. कई बार नंबर ब्लॉक भी कर दिया जाता था. गायनेकोलॉजी, पीडियाट्रिक्स और इमरजेंसी विभाग के मरीजों को ज्यादा निशाना बनाया गया, क्योंकि वहां भर्ती मरीजों की हालत गंभीर होती है. तीन पीड़ितों ने बताया कि उन्होंने मिलकर तीस हजार रुपये से ज्यादा की रकम भेजी, लेकिन उसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ.
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