कर्नाटक के स्कूलों में वॉटर बेल का फरमान, बच्चों को बार-बार पानी पिलाने की दिलाएगी याद; जानें क्यों कागजी है नया आदेश?

कर्नाटक सरकार ने स्कूलों में बच्चों को नियमित रूप से पानी पीने की याद दिलाने के लिए पानी की घंटी अनिवार्य करने का आदेश जारी किया है

GEMINI
Reepu Kumari

नई दिल्ली: कर्नाटक में स्कूलों के लिए जारी एक नया आदेश इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. पीएम-पोषण योजना के निदेशक ने सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में पानी की घंटी लगाने का निर्देश दिया है. इसका उद्देश्य बच्चों को नियमित अंतराल पर पानी पीने की आदत डालना बताया गया है, ताकि उनका स्वास्थ्य बेहतर रह सके.

लेकिन इस आदेश के सामने आते ही शिक्षा विभाग के ही आंकड़ों ने असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य के दर्जनों स्कूल ऐसे हैं, जहां आज भी पीने का पानी या शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं मौजूद नहीं हैं. ऐसे में पानी की घंटी का निर्देश जमीनी हकीकत से कटा हुआ नजर आ रहा है.

पानी की घंटी लगाने का आदेश

बुधवार को जारी परिपत्र में कहा गया है कि पानी की घंटी बच्चों को बार-बार पानी पीने की याद दिलाएगी. इससे चयापचय बेहतर होगा, शरीर में पानी की मात्रा संतुलित रहेगी और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य लाभ मिलेंगे. यह व्यवस्था एलकेजी से लेकर दसवीं कक्षा तक के सभी छात्रों के लिए अनिवार्य करने को कहा गया है.

आंकड़ों ने खोली पोल

स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक के 61 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध नहीं है. वहीं 170 स्कूल ऐसे हैं, जहां शौचालय की उचित व्यवस्था नहीं है. इन आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि कई स्कूल आज भी बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे हैं.

आदेश और हकीकत का टकराव

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जब स्कूलों में पानी ही उपलब्ध नहीं है, तो पानी की घंटी लगाने का आदेश व्यावहारिक नहीं लगता. यह स्थिति प्रशासनिक योजनाओं और जमीनी हालात के बीच बढ़ती खाई को उजागर करती है, जहां प्रतीकात्मक कदम पहले और बुनियादी सुविधाएं बाद में नजर आती हैं.

बाल अधिकार आयोग की भूमिका

कर्नाटक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष शशिधर कोसंबे ने मीडिया को बताया कि स्कूलों के दौरों के दौरान उन्होंने पाया कि बच्चे पर्याप्त पानी नहीं पी रहे थे. शिक्षकों से बातचीत के बाद उन्होंने शिक्षा और पीएम-पोषण विभाग को पत्र लिखकर पानी की घंटी लगाने का सुझाव दिया था.

बुनियादी सुविधाओं की जरूरत

हालांकि, इस पहल के साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि पहले स्कूलों में पीने का पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए. बिना इन मूलभूत व्यवस्थाओं के किसी भी स्वास्थ्य संबंधी पहल का लाभ सीमित रह जाएगा और बच्चों की समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी.