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रिटायर हुए लेकिन पढ़ाना नहीं छोड़ा, 7 साल से बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे कोडरमा के शिक्षक लाल बहादुर सिंह

कोडरमा के शिक्षक लाल बहादुर सिंह ने 33 साल सरकारी सेवा के बाद भी शिक्षा को नहीं छोड़ा. वे पिछले सात वर्षों से बिना शुल्क लिए सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं और शिक्षा को जीवन का मिशन मानते हैं.

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Kuldeep Sharma

कोडरमा: कोडरमा के वरिष्ठ शिक्षक लाल बहादुर सिंह शिक्षा की दुनिया में समर्पण की मिसाल बनकर उभरे हैं. 33 वर्षों तक सरकारी शिक्षक और प्राचार्य के रूप में सेवा देने के बाद वर्ष 2018 में रिटायर होने वाले लाल बहादुर सिंह आज भी शिक्षा से दूर नहीं हुए.

पिछले सात सालों से वे बिना किसी शुल्क के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. उनका मानना है कि शिक्षा एक जिम्मेदारी है, जिसे वे उम्र या पद से नहीं, बल्कि दिल से निभाते आ रहे हैं.

कोडरमा के शिक्षक बने प्रेरणा

कोडरमा में रहने वाले लाल बहादुर सिंह हमेशा से बच्चों के बीच रहकर पढ़ाने में विश्वास रखते रहे हैं. सरकारी सेवा में उन्होंने कई स्कूलों में पढ़ाया और अंतिम समय में प्लस टू उच्च विद्यालय कोडरमा के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए. शिक्षा को उन्होंने केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज सेवा की तरह निभाया. आज भी लोग उन्हें एक प्रेरक शिक्षक के रूप में जानते हैं, जिनकी पहचान बच्चों के भविष्य निर्माण से जुड़ी है.

जुनून ने लौटने के लिए किया प्रेरित

रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने कुछ समय घर पर बिताया, तो उन्हें खालीपन महसूस होने लगा. बच्चों के बीच रहने और उन्हें सीखने के नए तरीकों से जोड़ने की ललक उन्हें बार-बार शिक्षा की ओर खींचती रही. यही जुनून उन्हें वापस स्कूलों तक ले आया. उनका कहना है कि बच्चों की जिज्ञासा और उनकी आंखों की चमक उन्हें फिर से कक्षा में खड़ा होने की ताकत देती है.

बिना शुल्क लिए दे रहे सेवाएं

पिछले सात वर्षों से लाल बहादुर सिंह कोडरमा और जयनगर प्रखंड के आधे से अधिक सरकारी स्कूलों में विज्ञान विषय के गेस्ट फैकल्टी के रूप में पढ़ा रहे हैं. वे इसके लिए किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लेते. उनका लक्ष्य सिर्फ इतना है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और वे आधुनिक विषयों से जुड़ सकें. उनके अनुसार, 'विद्यार्थियों से मिलने वाला सम्मान और दिल की संतुष्टि किसी वेतन से कहीं ज्यादा कीमती है.'

रिटायरमेंट के बाद भी शिक्षा जीवन का उद्देश्य

जहां अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के बाद आराम और अपने लिए समय चुनते हैं, वहीं लाल बहादुर सिंह ने शिक्षा को ही जीवन का अंतिम उद्देश्य बनाया. उनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाने में जो खुशी मिलती है, वह किसी दूसरे काम में नहीं मिल सकती. उनके दिन की शुरुआत अक्सर बच्चों के साथ और चर्चाओं के साथ होती है, जिससे उन्हें नई ऊर्जा मिलती है.

समाज के लिए प्रेरणा बने लाल बहादुर सिंह

उनकी निस्वार्थ सेवा ने स्थानीय लोगों और अभिभावकों के बीच सम्मान और विश्वास बढ़ाया है. कई स्कूलों में उनके आने से बच्चों की उपस्थिति और विषय में रुचि बढ़ी है. शिक्षा विभाग भी उनके समर्पण की सराहना करता है. लाल बहादुर सिंह का जीवन संदेश देता है कि असली शिक्षक वही है, जो नौकरी खत्म होने पर भी शिक्षा की जिम्मेदारी निभाना नहीं छोड़ता.