अदालत के फैसले से 34 साल बाद करोड़पति बना पूर्व नेवी इंजीनियर, हादसे ने छीना था करियर; कानून ने दिया हक
मर्चेंट नेवी इंजीनियर जोगिंदर पाल हांडा को 34 साल बाद न्याय मिला. हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को बदलकर मुआवजे को ब्याज सहित 2.28 करोड़ रुपये कर दिया, जिससे उनके लंबे और कठिन संघर्ष की जीत हुई.
चंडीगढ़: न्याय की प्रतीक्षा कभी-कभी दशकों लंबी हो जाती है, लेकिन सत्य की जीत हमेशा सुखद होती है. मर्चेंट नेवी इंजीनियर जोगिंदर पाल हांडा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. साल 1991 में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे ने न केवल उनके शरीर को जख्मी किया, बल्कि उनके शानदार वैश्विक करियर को भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया. तीन दशक से अधिक समय तक अपमान और कानूनी अड़चनों को झेलने के बाद अब पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.
7 सितंबर 1991 का वह दिन हांडा के जीवन का सबसे दुखद मोड़ साबित हुआ. अंबाला में एक तेज रफ्तार जीप की टक्कर ने उनके स्कूटर को तहस-नहस कर दिया. इस हादसे में उनके दाहिने पैर की हड्डियां गंभीर रूप से टूट गईं. मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 50 प्रतिशत तक स्थायी रूप से दिव्यांग घोषित कर दिया. एक मर्चेंट नेवी इंजीनियर के लिए यह खबर किसी बड़े सदमे से कम नहीं थी, क्योंकि उनके पेशे में शारीरिक मजबूती की अनिवार्य मांग होती है.
सुनहरे भविष्य पर फिरा पानी
हादसे से मात्र तीन दिन पहले हांडा को सिंगापुर की एक प्रतिष्ठित कंपनी से नियुक्ति पत्र मिला था. उन्हें 1500 डॉलर प्रति माह के बड़े वेतन पर जहाज पर थर्ड इंजीनियर के रूप में तैनात होना था. 15 सितंबर को उनकी ज्वाइनिंग तय थी, पर अस्पताल के बिस्तर ने उनके सारे सपने छीन लिए. डॉक्टरों ने उन्हें समुद्री सेवा के लिए अनफिट घोषित कर दिया. यह केवल शारीरिक चोट नहीं थी, बल्कि एक चमकते अंतरराष्ट्रीय करियर का अंत था जिसने उन्हें काफी आर्थिक नुकसान पहुंचाया.
ट्रिब्यूनल का फैसला और कानूनी संघर्ष
अंबाला के क्लेम ट्रिब्यूनल ने 1995 में हांडा की पीड़ा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था. उनकी विदेशी नौकरी के ठोस प्रमाणों को अपर्याप्त मानते हुए अदालत ने केवल 50 हजार रुपये का मुआवजा तय किया. हांडा ने इस फैसले को अपने स्वाभिमान और करियर पर चोट माना. उन्होंने ट्रिब्यूनल के इस तर्क को चुनौती दी कि उनकी आय सिद्ध नहीं थी. इसके बाद शुरू हुआ हाई कोर्ट का लंबा कानूनी सफर, जिसमें हांडा ने हर कदम पर अपने हक के लिए मजबूती से लड़ाई लड़ी.
अदालत ने माना नियुक्ति पत्र को ठोस आधार
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल की गलतियों को सुधारा और स्पष्ट किया कि सिंगापुर का नियुक्ति पत्र पूरी तरह विश्वसनीय प्रमाण है. अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मर्चेंट नेवी जैसे कठिन पेशे में आधी दिव्यांगता भी करियर के लिए 100 प्रतिशत नुकसान के बराबर है. कोर्ट ने 1991 के डॉलर रेट को आधार बनाकर मुआवजे की नई गणना की. भविष्य की संभावनाओं को जोड़ते हुए मूल राशि 73,62,500 रुपये तय की गई, जो उनके संघर्ष की बड़ी जीत है.
34 साल का इंतजार और करोड़ों का हक
न्याय के तराजू ने आखिरकार हांडा के पक्ष में फैसला सुनाया है. मूल राशि पर 1996 से सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज जोड़ने के बाद कुल रकम 2.28 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है. यह बड़ी राशि उनके 34 वर्षों के लंबे इंतजार, अनगिनत अदालती चक्करों और खोए हुए अवसरों की न्यायिक भरपाई है. यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि कानून की प्रक्रिया भले ही धीमी हो, लेकिन वह सच्चाई को पहचानने में सक्षम है. हांडा के लिए यह केवल पैसा नहीं, सम्मान है.
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