चंडीगढ़: हरियाणा एक ऐसा राज्य जिसका नाम कई कारणों से बदनाम है. उनमें से सबसे बड़ा कारण महिला और पुरषों की बीच भेदभाव है. हरियाणा में दश्कों पुरानी "पुरुष-महिला समस्या" एक ऐतिहासिक और लगातार बना हुआ लैंगिक असंतुलन है. इसकी जड़ें गहरी पितृसत्तात्मक सोच, बेटे की चाहत और कन्या भ्रूण हत्या जैसी प्रथाओं में हैं.
इन सबसे आगे बढ़कर हरियाणा में सेक्स रेशियो में काफी सुधार हुआ है, जो 2025 में 923 पर पहुंच गया है. वहीं 2024 से यह 13 पॉइंट ज्यादा है. अधिकारियों ने इस बढ़ोतरी का श्रेय जन्म से पहले लिंग जांच और अवैध गर्भपात को रोकने के लिए उठाए गए कई कदमों को दिया है.
अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि हरियाणा में 2025 में जन्म के समय सेक्स रेशियो (SRB) 923 दर्ज किया गया, जो पिछले पांच सालों में सबसे ज़्यादा है, जबकि 2024 में यह 910 था. डेटा से पता चला कि 2025 में राज्य में 5,19,691 जन्म दर्ज किए गए 2,70,281 लड़के और 2,49,410 लड़कियां, जबकि 2024 में 5,16,402 जन्म हुए थे, जिसमें 2,46,048 लड़कियां थीं.
हरियाण में पुरानी सोच और नए बदलाव को सकारत्मक रूप से देखा जा रहा है. कई लोगों का कहाना है कि यह विश्वनीय है. वहीं कई का कहना है कि अभी भी सरकार को लोगों की सोच बदलने में वक्त लगेगा.
असंतुलित लिंग अनुपात: हरियाणा में ऐतिहासिक रूप से भारत में सबसे कम लिंग अनुपात रहा है. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, यहां प्रति 1,000 पुरुषों पर केवल 877 महिलाएं थीं (राष्ट्रीय औसत 940 की तुलना में). बच्चों का लिंग अनुपात और भी कम था, प्रति 1,000 लड़कों पर 830 लड़कियां.
हालांकि 2015 के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के बाद जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार हुआ, जो 2019 में 923 पर पहुंच गया, लेकिन तब से यह फिर से गिरकर 2024 में लगभग 910 के आठ साल के निचले स्तर पर आ गया है.
लिंग निर्धारण के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों (जैसे अल्ट्रासाउंड तकनीक) का दुरुपयोग और उसके बाद लिंग-चयनात्मक गर्भपात इस असंतुलन का एक प्रमुख कारण है.