'साहब मैं अभी जिंदा हूं', कागजों में मृत पवन कुमार ने सिस्टम से लगाई गुहार
हरियाणा के फरीदाबाद में पवन कुमार नाम के एक जिंदा व्यक्ति को सरकारी दस्तावेजों में 'मृत' घोषित कर दिया गया है. वे पिछले दो सालों से दफ्तरों के चक्कर काटकर खुद को कागजों पर जिंदा साबित करने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.
फरीदाबाद: कागजों पर किसी जिंदा इंसान को 'मुर्दा' घोषित कर देना सरकारी तंत्र की एक ऐसी लापरवाही है जो किसी भी हंसते-खेलते इंसान की जिंदगी को नर्क बना सकती है. हरियाणा से एक ऐसा ही झकझोर देने वाला मामला सामने आया है जहां एक शख्स पिछले दो सालों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर सिर्फ यही चिल्ला रहा है कि 'साहब मैं अभी जिंदा हूं!'.
यह अजीबोगरीब और परेशान करने वाला मामला हरियाणा के फरीदाबाद जिले के बल्लभगढ़ के मिर्जापुर गांव का है. यहां के रहने वाले 49 वर्षीय पवन कुमार पिछले दो साल से खुद को कागजों पर जिंदा साबित करने की अनोखी और दर्दनाक लड़ाई लड़ रहे हैं.
2024 में कागजों में किया मृत घोषित
पवन कुमार के मुताबिक सरकारी दस्तावेजों में साल 2024 से ही उन्हें 'मृत' घोषित कर दिया गया है. इस एक सरकारी गलती ने उनकी पूरी जिंदगी को पटरी से उतार दिया है. चूंकि वह कागजों में मर चुके हैं इसलिए उन्हें आम जिंदगी में कदम-कदम पर भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इस गलती की वजह से उनकी पहचान से जुड़ी सभी सरकारी सेवाएं जनकल्याणकारी योजनाएं और जरूरी आधिकारिक लाभ पूरी तरह से बंद हो चुके हैं.
दो सालों से लगा रहे गुहार
पवन का कहना है कि वे इस गलती को सुधारने के लिए लगातार अलग-अलग सरकारी विभागों के दरवाजे खटखटा रहे हैं. पिछले दो सालों में वे डिप्टी कमिश्नर दफ्तर से लेकर जनता दरबार और कई प्रशासनिक अधिकारियों के पास अपनी गुहार लगा चुके हैं. वे अपनी शिकायत के साथ खुद के जिंदा होने के सारे जरूरी दस्तावेज भी जमा कर चुके हैं लेकिन उनका आरोप है कि आश्वासन के अलावा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है.
आर्थिक नुकसान से हैं परेशान
इस स्थिति ने उनके सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. आर्थिक नुकसान के साथ-साथ उनके सामाजिक सम्मान को भी ठेस पहुंच रही है, क्योंकि जहां भी पहचान का वेरिफिकेशन होता है उन्हें अपनी इस अजीब स्थिति की सफाई देनी पड़ती है. पवन कुमार कहते हैं कि जब भी वे किसी दफ्तर जाते हैं उन्हें नए दस्तावेज लाने या किसी नई प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कह दिया जाता है.
दो साल से वे सिर्फ अपना समय और पैसा बर्बाद कर रहे हैं. यह मामला दिखाता है कि सिस्टम की एक छोटी सी लापरवाही किसी आम नागरिक के कानूनी अधिकारों और पहचान को कैसे छीन सकती है. पवन को अब भी उम्मीद है कि प्रशासन जल्द जागेगा और उनके जिंदा होने का हक उन्हें वापस लौटाएगा.
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