सावधान! मसूरी रोड की 4 ढलानों पर मंडरा रहा बड़ा खतरा, वैज्ञानिकों ने जारी की चेतावनी
देहरादून-मसूरी मार्ग पर हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन में चार ढलानों को बेहद अस्थिर पाया गया है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भारी बारिश, सड़क कटिंग और अनियोजित निर्माण के कारण भविष्य में बड़े भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है.
उत्तराखंड में मानसून के दौरान लगातार हो रहे भूस्खलनों के बीच देहरादून-मसूरी मार्ग को लेकर एक चिंताजनक वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है. अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इस मार्ग पर चिन्हित 18 सड़क कटिंग वाली ढालों में से चार ढलानें बेहद अस्थिर हैं. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि भारी बारिश और अनियोजित निर्माण गतिविधियां इसी तरह जारी रहीं तो आने वाले समय में बड़े भूस्खलन की घटनाएं हो सकती हैं. यह अध्ययन भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (इसरो), ग्राफिक एरा डीम्ड विश्वविद्यालय, बनस्थली विद्यापीठ और एमिटी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने किया है.
18 संवेदनशील ढालों का किया गया वैज्ञानिक अध्ययन
शोध का उद्देश्य देहरादून-मसूरी राजमार्ग पर सड़क कटिंग वाली ढालों की स्थिरता का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान करना था. इसके लिए वैज्ञानिकों ने 18 संवेदनशील ढालों का विस्तृत फील्ड सर्वे किया. अध्ययन के दौरान चट्टानों की मजबूती, ढाल का कोण, भूगर्भीय संरचना, दरारों की दिशा और वर्षा के प्रभाव जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं का विश्लेषण किया गया.
इन चार ढलानों को बताया सबसे ज्यादा खतरनाक
अध्ययन में झड़ीपानी क्षेत्र की ढाल संख्या 3, 4 और 6 तथा हाथीपांव-मसूरी मार्ग की ढाल संख्या 10 को वर्तमान में सबसे अधिक अस्थिर पाया गया. वहीं, झरिपानी (जूनू) जलप्रपात के आसपास की ढालें अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थिर मिलीं. हालांकि वैज्ञानिकों ने आगाह किया कि जो ढलानें अभी आंशिक रूप से अस्थिर हैं, वे भी लगातार भारी बारिश और अव्यवस्थित निर्माण के कारण भविष्य में खतरनाक साबित हो सकती हैं.
Also Read
- कारगिल के वीरों को CM योगी का नमन, बोले- शौर्य, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा का अमर प्रतीक है ये दिन
- कारगिल विजय दिवस पर राष्ट्र ने वीरों को किया नमन, राष्ट्रपति मुर्मु से लेकर PM मोदी तक; शीर्ष नेताओं ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
- 10 से 12 इंच पंख, लेकिन नहीं है तितली! चमोली में दिखा दुर्लभ एटलस मॉथ; जानिए क्यों है इतना खास
शोधकर्ताओं ने भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए फ्रीक्वेंसी रेशियो मॉडल का इस्तेमाल किया. इस मॉडल में ढाल का झुकाव, ऊंचाई, भूमि की वक्रता, वर्षा, चट्टानों का प्रकार, जलधाराओं और भूगर्भीय दरारों से दूरी समेत आठ प्रमुख कारकों का विश्लेषण किया गया. सांख्यिकीय परीक्षण में इस मॉडल की पूर्वानुमान क्षमता 78 प्रतिशत और एरिया अंडर कर्व (AUC) 61 प्रतिशत दर्ज की गई, जिसे वैज्ञानिकों ने स्वीकार्य सटीकता वाला परिणाम बताया.
प्राकृतिक नहीं, मानव गतिविधियां भी बढ़ा रहीं खतरा
अध्ययन के अनुसार मसूरी क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं बढ़ रहा है. तेजी से हो रहा शहरीकरण, सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटिंग, अनियोजित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही तीव्र वर्षा भी ढालों को लगातार कमजोर बना रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में जोखिम और बढ़ सकता है.