बिहार में NDA का 'पंच', राज्यसभा चुनाव में किया क्लीन स्वीप; धरी रह गई महागठबंधन की रणनीति
बिहार राज्यसभा चुनाव में एनडीए ने पांचों सीटों पर कब्जा कर बड़ी जीत दर्ज की है. राजद की दो सीटों पर कब्जा करते हुए नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा समेत पांचों उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि विपक्ष पिछड़ गया.
नई दिल्ली: बिहार की सियासत में सोमवार का दिन एनडीए के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हुए चुनाव में सत्ताधारी गठबंधन ने क्लीन स्वीप करते हुए विपक्ष को पूरी तरह पस्त कर दिया है. 16 मार्च को हुए इस मतदान में एनडीए ने रणनीतिक बढ़त बनाते हुए राजद के कब्जे वाली दो सीटों को भी अपने नाम कर लिया. यह जीत आगामी चुनावों से पहले एनडीए के लिए संजीवनी की तरह है, जिसने विपक्षी एकजुटता के दावों की पोल खोल दी है.
एनडीए के लिए यह चुनाव किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं रहा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में गठबंधन ने पूरी एकजुटता दिखाई. सोमवार को हुई वोटिंग के बाद जब नतीजे आए, तो यह साफ हो गया कि एनडीए ने सभी पांच सीटों पर जीत हासिल कर ली है. इसमें भाजपा, जदयू और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उम्मीदवारों ने मिलकर विपक्ष के गणित को पूरी तरह बिगाड़ दिया. इस निर्णायक जीत से सदन में एनडीए की विधायी ताकत में काफी इजाफा हुआ है.
प्रमुख उम्मीदवारों की जीत
जीतने वाले दिग्गजों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम प्रमुख है. उनके साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर ने भी जीत दर्ज की. भाजपा के शिवेश राम ने भी अपनी सीट सुरक्षित की. रामनाथ ठाकुर जननायक कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं.
महाबंधन का 'खेला' पड़ा भारी
इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात राजद और कांग्रेस विधायकों का रुख रहा. चर्चा थी कि विपक्षी गठबंधन कुछ 'खेला' कर सकता है, लेकिन पासा उल्टा पड़ गया. महागठबंधन के उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह (एडी सिंह) को हार का सामना करना पड़ा. बताया जा रहा है कि कांग्रेस और राजद के कुछ विधायकों ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया, जिससे विपक्ष की रणनीति धराशायी हो गई.
दो सीटों का पासा पलटा
एनडीए ने राजद की दो पारंपरिक राज्यसभा सीटों को अपने पाले में कर लिया. वोटिंग के दौरान राजद खेमे में मची हलचल का फायदा सीधे तौर पर एनडीए को मिला. राजद के पास पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद वे अपनी सीटों को बचाने में नाकाम रहे. राजनीतिक गलियारों में इस जीत को नीतीश कुमार और भाजपा की रणनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है. यह हार महागठबंधन के भीतर आपसी तालमेल की भारी कमी और अविश्वास को भी पूरी तरह उजागर करती है.
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