यहां दुल्हन नहीं, दूल्हा जाता है ससुराल! इस राज्य में शादी के बाद नहीं होती बेटी की विदाई?

भारत में शादी के बाद आमतौर पर दुल्हन अपने पति के घर जाती है, लेकिन मेघालय की खासी जनजाति में परंपरा इससे अलग है.

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Reepu Kumari

Meghalaya Wedding Traditions: भारत में शादी को लेकर अलग अलग राज्यों और समुदायों में कई तरह की परंपराएं देखने को मिलती हैं. ज्यादातर परिवारों में विवाह के बाद बेटी अपना घर छोड़कर पति के परिवार के साथ रहने लगती है. लेकिन क्या आपने ऐसे समाज के बारे में सुना है, जहां शादी के बाद दूल्हे को पत्नी के घर जाकर बसना पड़ता है? मेघालय की खासी जनजाति में विवाह और परिवार से जुड़ी परंपराएं इस मामले में बाकी समाजों से अलग हैं.

मां के नाम से आगे बढ़ता है परिवार

खासी समुदाय में मातृवंशीय व्यवस्था प्रचलित है.इसका मतलब है कि परिवार का वंश मां की ओर से आगे बढ़ता है.इस व्यवस्था में बच्चों की पहचान मां के परिवार से जुड़ी होती है और वे मां का उपनाम अपनाते हैं.यहां परिवार की परंपराओं और रिश्तों को समझने में मातृवंश की अहम भूमिका होती है.हालांकि, मातृवंशीय व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि समाज के हर फैसले पर केवल महिलाओं का ही अधिकार होता है.

बेटी को मिलती है पारिवारिक संपत्ति

खासी समाज की एक खास पहचान संपत्ति के उत्तराधिकार की परंपरा है.यहां पारिवारिक संपत्ति मां से बेटी को हस्तांतरित होती है, न कि सामान्य पितृवंशीय व्यवस्था की तरह पिता से बेटे को. इस समुदाय में सबसे छोटी बेटी को कई परिवारों में पैतृक संपत्ति का विशेष उत्तराधिकारी माना जाता है.हालांकि, उत्तराधिकार से जुड़े नियम परिवार और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग हो सकते हैं. शादी के बाद पति का पत्नी के घर रहना भी इसी सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है.


जीवनसाथी चुनने में मिलती है आजादी

खासी समुदाय में विवाह से जुड़े कुछ नियम भी हैं. एक ही कुल या कबीले के सदस्यों के बीच विवाह पर रोक रहती है. पारंपरिक तौर पर युवाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी दी जाती है और कुछ मामलों में लड़कियां भी पहल कर सकती हैं. शादी से पहले लड़का और लड़की एक दूसरे को समझने का समय लेते हैं. विवाह को आगे बढ़ाने में दोनों परिवारों की सहमति भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. इन परंपराओं का पालन स्थानीय रीति रिवाजों के अनुसार होता है.

शादी की रस्में और कपड़ों की खास पहचान

खासी समुदाय में विवाह की रस्में परिवार और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग अलग हो सकती हैं. कुछ विवाहों में बड़ी औपचारिक रस्मों के बजाय सीमित समारोह होता है, जिसमें जोड़ा अंगूठियों का आदान प्रदान भी कर सकता है. यहां पारंपरिक पहनावे का भी खास महत्व है. महिलाएं पारंपरिक आभूषण पहनती हैं और खासी महिलाओं के पारंपरिक परिधान को आमतौर पर जैनसेम (Jainsem) कहा जाता है. यह पहनावा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

दहेज की जगह परंपराओं को महत्व

खासी समुदाय की विवाह परंपराओं में दहेज प्रथा का सामान्य तौर पर प्रचलन नहीं है. विवाह से जुड़ी रस्मों, पारिवारिक संबंधों और पारंपरिक पहनावे को अधिक महत्व दिया जाता है. हालांकि, किसी भी समुदाय में सभी परिवारों की प्रथाएं बिल्कुल एक जैसी नहीं होतीं.