नई दिल्ली: 1 अप्रैल का दिन आते ही चारों तरफ हंसी-मजाक और शरारतों का माहौल छा जाता है. अप्रैल फूल डे के नाम से मशहूर यह दिन दुनिया भर में मूर्ख बनाने और बनने का दिन होता है. सदियों से चली आ रही इस परंपरा में लोग छोटे-बड़े प्रैंक्स करते हैं और मीडिया भी इसमें पीछे नहीं रहता. आज भी यह दिन लोगों को याद दिलाता है कि हंसना और हंसाना जीवन का जरूरी हिस्सा है. आइए जानते हैं इस दिन की शुरुआत और कुछ ऐसे प्रैंक्स के बारे में जो इतिहास में दर्ज हो गए.
अप्रैल फूल डे को मूर्ख दिवस भी कहा जाता है. इस दिन लोग जानबूझकर दूसरों को सरल-साधारण तरीके से मूर्ख बनाते हैं. इसकी जड़ें यूरोप में सदियों पुरानी मानी जाती हैं. समय के साथ यह परंपरा पूरी दुनिया में फैल गई और अब सोशल मीडिया के जमाने में भी यह जोरों पर है.
1957 में बीबीसी ने एक रिपोर्ट प्रसारित की जिसमें दावा किया गया कि स्विट्जरलैंड में स्पेगेटी के पेड़ों से नूडल्स तोड़े जा रहे हैं. रिपोर्ट में पेड़ों से स्पेगेटी काटते हुए किसानों का फुटेज भी दिखाया गया. हजारों दर्शक इस खबर पर विश्वास कर गए और कई लोगों ने बीबीसी को फोन करके स्पेगेटी उगाने का तरीका पूछा. यह अप्रैल फूल का सबसे क्लासिक प्रैंक माना जाता है.
1985 में स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड पत्रिका ने सिड फिंच नाम के एक काल्पनिक बेसबॉल खिलाड़ी की कहानी छापी. दावा किया गया कि वह 168 मील प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंक सकता है. कई पाठक इस लेख को सच मान बैठे. यह प्रैंक खेल प्रेमियों को लंबे समय तक याद रहा.
1992 में नेशनल पब्लिक रेडियो ने फर्जी खबर प्रसारित की कि पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन फिर चुनाव लड़ रहे हैं. 1996 में टैको बेल ने घोषणा की कि उसने लिबर्टी बेल खरीद लिया है और उसका नाम टैको लिबर्टी बेल रख दिया जाएगा. दोनों ही प्रैंक्स ने पूरे अमेरिका को हंसा दिया और चौंका भी दिया.
अप्रैल फूल डे हमें याद दिलाता है कि जीवन में हल्का-फुल्का मजाक भी जरूरी है. हालांकि आजकल प्रैंक्स करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी की भावनाएं आहत न हों. इस दिन का असली मकसद हंसना और हंसाना है, न कि किसी को ठेस पहुंचाना.