गर्भ में मौजूद भ्रूण को भी बीमार कर रहा वायु प्रदूषण, एक्सपर्ट्स बोले- अब एक्शन नहीं लिया तो छोटी हो जाएंगी सांसें

चीन के अध्ययनों से साबित हुआ कि पीएम2.5 जैसे कण महिलाओं के अंडों की संख्या घटाते हैं और पुरुषों की शुक्राणु गतिशीलता बाधित करते हैं.

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Sagar Bhardwaj

हर सांस के साथ हम न केवल ऑक्सीजन ले रहे हैं बल्कि अदृश्य जहर भी ले रहे हैं. वायु प्रदूषण का यह विष आज गर्भ के अंदर पल रहे नवीन जीवन को भी घेर रहा है. वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि प्रदूषण की मार प्रजनन से शुरू होकर जन्म और बचपन तक फैल जाती है.

चीन, ईरान और यूरोप के अध्ययनों से सामने आया है कि महीन कण जैसे पीएम1 और पीएम2.5 सीधे रक्तप्रवाह में घुसकर हार्मोन संतुलन बिगाड़ देते हैं. भारत जैसे प्रदूषित देशों में यह चुपके से आने वाली पीढ़ी की सेहत पर सवाल खड़े कर रहा है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अब कार्रवाई का वक्त है वरना सांसें और छोटी हो जाएंगी. 

प्रदूषण से घटती है प्रजनन क्षमता

महिलाओं और पुरुषों दोनों की प्रजनन शक्ति वायु प्रदूषण से पहले ही कमजोर पड़ने लगती है. फरवरी 2023 में एनवायर्नमेंटल रिसर्च जर्नल में छपी चीन की स्टडी बताती है कि प्रदूषण बढ़ने पर महिलाओं के अंडाशय में अंडों की संख्या घटती है. एंटी-म्यूलरियन हार्मोन, जो अंडों का संकेतक है में पीएम1 की हर 10 माइक्रोग्राम वृद्धि से 8.8 फीसदी गिरावट आती है.

इसी तरह पीएम2.5, पीएम10 और एनओ2 भी गुणवत्ता प्रभावित करते हैं. शोधकर्ता कहते हैं कि ये सूक्ष्म कण फेफड़ों से रक्त में घुसकर अंडाशय को नुकसान पहुंचाते हैं. पुरुषों पर फरवरी 2022 की जामा नेटवर्क स्टडी में पाया गया कि पीएम2.5 से शुक्राणुओं की गतिशीलता 33,876 मामलों में कम हुई. ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस इसका मुख्य कारण है. 

गर्भ में भ्रूण की बढ़ती मुश्किलें

गर्भधारण हो जाने पर भी प्रदूषण भ्रूण को नहीं छोड़ता. जून 2017 के ईरानी अध्ययन में जर्नल ऑफ फैमिली एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ ने खुलासा किया कि पहली तिमाही में प्रदूषण से प्लेसेंटा का वजन घटता है, जो विकास का आधार है.

लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ की समीक्षा से पता चला कि गर्भनाल के रक्त में ब्लैक कार्बन कण यकृत, फेफड़ों और मस्तिष्क तक पहुंचते हैं. इससे समय से पहले प्रसव, कम वजन जन्म, फेफड़ों की कमजोरी और नवजात मृत्यु का खतरा बढ़ता है.

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉ. सुधीर गुप्ता कहते हैं कि प्रदूषण से मां को कम ऑक्सीजन मिलती है, सल्फर बढ़ने पर गर्भपात संभव है. डॉ. भूपेंद्र शर्मा जोड़ते हैं कि इससे एनीमिया होता है, स्वस्थ बच्चा मुश्किल. 

जन्म के बाद विकास पर काला साया

बचपन में प्रदूषण दिमाग और शरीर दोनों को चोट पहुंचाता है. मई 2022 के न्यूरोसाइंस एंड बिहेवियरल रिव्यूज में 30 स्टडीज की समीक्षा से साफ है कि पीएम2.5 और एनओ2 से बुद्धि, स्मृति, ध्यान और भाषा कौशल प्रभावित होते हैं.

तीसरी तिमाही में ज्यादा संपर्क से नवजात का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. हृदय दोष, फेफड़ों की कम क्षमता और श्वसन संक्रमण के जोखिम भी चढ़ते हैं. पांच साल से कम बच्चों पर सर्वे में पीएम2.5 की 10 यूनिट वृद्धि से संक्रमण 20 फीसदी ज्यादा. आंतों के सूक्ष्मजीव असंतुलित होकर एलर्जी, मोटापा और डायबिटीज का खतरा पैदा करते हैं. 2020 की गट माइक्रोब्स स्टडी कहती है कि ये जीव भूख, इम्यूनिटी और मूड नियंत्रित करते हैं. (77 शब्द)सेलुलर 

स्तर पर जहर का असर

प्रदूषण कोशिकाओं की प्रोटीन गतिविधि तक बदल देता है. सितंबर 2023 की यूरोपीयन रेस्पिरेटरी सोसाइटी कांग्रेस में मिलान स्टडी ने बताया कि एनओ2 से ऑटोफैगी प्रक्रिया बाधित होती है, जहां कोशिकाएं खुद को ठीक करती हैं. इससे सिरट1 प्रोटीन कम हो जाता है, जो सूजन और उम्र के नुकसान से बचाता है.

यूरोपीय शोधों में वाहन धुंए से न्यूरॉन्स विकास रुकता है, खासकर सड़क किनारे रहने वालों में. 2013 की स्टडी ने बचपन कैंसर से लिंक जोड़ा. किशोरियों में हार्मोन सिस्टम बिगड़कर जल्दी मासिक धर्म शुरू हो जाता है. भारत में विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण बच्चों की मौत का बड़ा कारण है. 

भारत में बढ़ता संकट और चेतावनी

देश में वायु प्रदूषण बच्चों के लिए घातक साबित हो रहा है. नवंबर 2023 की एम्स दिल्ली और आईआईटी की रिपोर्ट 'कोलैबोरेशन फॉर एयर पॉल्यूशन एंड हेल्थ' कहती है कि पांच साल से कम बच्चों की मौत में यह तीसरा बड़ा कारक है, 14 साल से कम में दूसरा.

2010 के बाद दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में पीएम2.5 से मौतें सबसे ज्यादा. रिपोर्ट चेताती है- बिना कार्रवाई के आने वाली पीढ़ी सांस लेना भूल जाएगी. विशेषज्ञ नीतियां सख्त करने की मांग कर रहे हैं.