जब इरादों में सच्चाई और सपनों में जान होती है, तो गरीबी और तंगहाली भी रास्ते का रोड़ा नहीं बन पातीं. ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी केरल के वायनाड जिले के बेहद साधारण कुरुचिया आदिवासी परिवार की बेटी की है. माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते थे और घर में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था. ऐसे कठिन दौर में पली-बढ़ी श्रीधन्या सुरेश ने अपनी मेहनत से जो मुकाम हासिल किया, उसने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है.
श्रीधन्या का बचपन बहुत ही तंगहाली में बीता. प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें रोज़ाना चार किलोमीटर का कठिन सफर पैदल तय करना पड़ता था. बाद में जनजाति विकास विभाग में काम करते समय उनकी मुलाकात एक अधिकारी से हुई. उनके काम करने के तरीके और समाज में मिलने वाले सम्मान को देखकर श्रीधन्या के मन में देश सेवा करने की इच्छा जागी और उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की.
लिखित परीक्षा पास करने के बाद श्रीधन्या के सामने सबसे बड़ा संकट दिल्ली जाकर इंटरव्यू देने का खड़ा हुआ. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि ट्रेन टिकट और ठहरने का खर्च उठाना नामुमकिन था. इस नाज़ुक मोड़ पर उनके दोस्तों ने एक-एक पैसा जुटाकर करीब 40 हजार रुपये की मदद की, जिससे वह दिल्ली पहुंचकर अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण इंटरव्यू दे सकीं.
सालों की लगन आखिरकार रंग लाई और साल 2019 में आईएएफ परीक्षा के नतीजों ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी. श्रीधन्या ने ऑल इंडिया 410वीं रैंक हासिल की और केरल की पहली आदिवासी महिला आईएएस बनने का गौरव पाया. दिलचस्प बात यह रही कि जिस अधिकारी के काम से प्रेरित होकर उन्होंने यह राह चुनी थी, आगे चलकर उन्हें उन्हीं के साथ काम करने का मौका मिला.
असिस्टेंट कलेक्टर के तौर पर अपने करियर का आगाज करने वाली श्रीधन्या ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा मनवाया है. वर्तमान में कासरगोड जिले के कलेक्टर पद की जिम्मेदारी संभाल रहीं श्रीधन्या का यह सफर देश के लाखों युवाओं को संदेश देता है कि यदि आपके पास जज्बा और मेहनत करने की हिम्मत है, तो दुनिया की कोई भी रुकावट आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती.