नई दिल्ली: ईरान में जारी राजनीतिक संकट और हिंसक प्रदर्शनों ने मध्य पूर्व को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं. ट्रंप ने कहा है कि खामेनेई सरकार ने नागरिकों की हत्या कर रेड लाइन पार कर ली है और अमेरिका सैन्य विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है. उधर ईरान ने भी साफ कर दिया है कि किसी भी हमले का जवाब सीधे अमेरिकी और इजराइली ठिकानों पर दिया जाएगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया है. उनका कहना है कि ईरानी नेतृत्व ने प्रदर्शनकारियों पर जिस तरह की कार्रवाई की है, उसने सभी सीमाएं पार कर दी हैं. ट्रंप के बयान को मध्य पूर्व में सैन्य कार्रवाई का संकेत माना जा रहा है. वॉशिंगटन में यह चर्चा तेज है कि अगर हालात और बिगड़े तो अमेरिका सीधे हस्तक्षेप कर सकता है.
ट्रंप के बयान के जवाब में ईरान के शीर्ष नेताओं ने भी आक्रामक रुख दिखाया है. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिका और इजराइल के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाएगा. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनका देश किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है और जवाबी कार्रवाई पूरे क्षेत्र में की जाएगी.
अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की जून 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य पूर्व में अमेरिका के करीब 40 हजार सैनिक तैनात हैं. इनमें से कई सैनिक युद्धपोतों पर मौजूद हैं. अमेरिका ने रणनीतिक रूप से ईरान को घेरने के लिए इस क्षेत्र में मजबूत सैन्य ढांचा खड़ा किया है. इससे किसी भी संघर्ष की स्थिति में हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं.
मध्य पूर्व के करीब 19 ठिकानों पर अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. इनमें बहरीन, मिस्र, इराक, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, सीरिया और यूएई प्रमुख हैं. करीब आठ देशों में अमेरिकी फौजें स्थायी रूप से मौजूद हैं. कतर का अल उदेद एयर बेस अमेरिका का सबसे बड़ा अड्डा है, जबकि बहरीन में अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा तैनात है.
सैन्य ताकत के मामले में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है. ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के अनुसार अमेरिका का रक्षा बजट करीब 895 अरब डॉलर है और उसके पास 14 लाख सक्रिय सैनिक हैं. वहीं ईरान इस सूची में 16वें स्थान पर है. हालांकि ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता उसे खतरनाक बनाती है. जानकारों का मानना है कि युद्ध छिड़ा तो ईरान अपने सहयोगी गुटों के जरिए पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैला सकता है. इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.