अमेरिका-ईरान के बीच लगभग चार महीने से चल रहा तनाव अब खत्म होने की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है. हालांकि, इस डील को इजरायल और खुद अमेरिका के कुछ नेताओं की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.
आलोचक इसे अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विफलता बता रहे हैं. इसी बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कई सवालों के जवाब देकर लोगों की उलझनों को दूर करने की कोशिश की है.
जेडी वेंस शुरू से ही इस डील को डोनाल्ड ट्रंप की एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं. उन्होंने ईरान के साथ साइन किए गए 14 बिंदुओं वाले एमओयू को अमेरिका के हित में बताया है. साथ ही समझौते से जुड़े कई अहम मुद्दों पर भी उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की. इनमें प्रतिबंधों में ढील और ईरान के लिए प्रस्तावित 300 अरब डॉलर का निर्माण फंड शामिल है.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो गई है और इसके बारे में सांसदों को प्रशासन की ओर से जल्द जानकारी दी जाएगी. आलोचकों द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर वेंस ने कहा कि उन्होंने इस समझौते को लेकर जो प्रतिक्रियाएं पढ़ी और सुनी हैं, उनमें से कई तथ्यात्मक रूप से गलत हैं.
वेंस ने कहा कि यह एक एमओयू है और इसका उद्देश्य अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहित करना तथा गलत व्यवहार को दंडित करना है. उन्होंने आलोचकों से राष्ट्रपति ट्रंप पर भरोसा रखने की भी अपील की. वेंस ने कहा कि जो लोग यह सोचते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसा कोई समझौता करेंगे जो अमेरिका के खिलाफ हो, वे यह भूल रहे हैं कि ट्रंप ने पिछले डेढ़ साल में ईरान समेत कई देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को नई दिशा देने का साहस दिखाया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति के एक विवादित बयान पर भी जेडी वेंस ने अपना पक्ष रखा. दरअसल, जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा था कि यदि यह डील सफल रही तो उसका श्रेय वह लेंगे और यदि यह असफल रही तो इसकी जिम्मेदारी जेडी वेंस पर डाल देंगे. इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए वेंस ने कहा कि उनके अनुसार राष्ट्रपति मजाक कर रहे थे, जैसा कि वह अक्सर करते हैं.
जब एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि क्या इस एमओयू से इजरायल के प्रधानमंत्री नाराज हैं, तो वेंस ने कहा कि यदि वह इजरायली सरकार की कैबिनेट में होते, तो शायद उस एकमात्र शक्तिशाली सहयोगी के खिलाफ ऐसी टिप्पणी नहीं करते जो आज भी उनके साथ खड़ा है. उन्होंने इजरायल के कुछ अधिकारियों की आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि पिछले तीन महीनों में देश की सुरक्षा में इस्तेमाल हुए रक्षा उपकरणों का बड़ा हिस्सा अमेरिकी सहायता से उपलब्ध कराया गया है और इसके लिए अमेरिकी करदाताओं का पैसा खर्च हुआ है.
बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, जिसमें कुल 14 बिंदु शामिल हैं. अब इन मुद्दों पर अगले 60 दिनों तक चर्चा होगी, जिसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जाएगा. हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप के इस फैसले को लेकर अमेरिका और इजरायल के कुछ राजनीतिक वर्गों में नाराजगी बनी हुई है. आलोचकों का दावा है कि यह समझौता ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की विफलता को दर्शाता है. उनका कहना है कि इस अभियान पर अमेरिकी करदाताओं का भारी धन खर्च हुआ. वहीं एमओयू में शामिल 300 अरब डॉलर के प्रस्तावित फंड को लेकर भी विवाद जारी है.