हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म में शुभ और धार्मिक माने जाने वाला स्वस्तिक जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के नाजी प्रतीक से काफी हद तक मिलता है. इस प्रतीक को लेकर कई बार तनाव देखने को मिला है, एक नए मामले में अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित केप मे कोस्ट गार्ड ट्रेनिंग सेंटर में बाथरूम की दीवार पर मिले इस निशान ने पूरे सिस्टम को हिला दिया.
इस घटना ने इतिहास, संस्कृति और पूर्वाग्रहों पर बहस छेड़ दी है. कुछ लोगों ने इसे नफरत का संकेत बताया है, वहीं कुछ ने इसे सांस्कृतिक गलतफहमी का नतीजा बताया है. लेकिन इस प्रतीक पर बहस क्यों होता रहा है, इस बात को समझने के लिए हमारे इस लेख को पढ़ें.
पश्चिमी देशों में इस निशान को नाजी प्रतीक के रूप में इसलिए देखा जाता है क्योंकि 20वीं शताब्दी में हिटलर की नाजी पार्टी ने 1920 में अपने झंडे में लाल, सफेद और काले रंगों के साथ इस प्रतीक को भी शामिल किया गया था. हिटलर ने इसे आर्य नस्ल की श्रेष्ठता और विजय का प्रतीक बताया था. लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लाखों यहूदियों का पर किए गए अत्याचार और नरंसहार ने इस प्रतीक को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया. आज यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में इसे नफरत का संकेत समझा जाता है. वहीं दुनिया के दूसरे हिस्से में इसका अर्थ बिल्कुल विपरीत है.
भात में इसे स्वास्तिक कहा जाता है. इस शब्द को संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'शुभ' या 'मंगलकारी' होता है. हिंदू धर्म का यह हजारों साल पुराना चिन्ह है. इस धर्म में इसे सूर्य देवता से जोड़ा जाता है. वहीं जैन धर्म में यह तीर्थंकरों का चिन्ह है, जबकि बौद्ध परंपरा में इसे बुद्ध के पदचिन्हों से जोड़ा जाता है.
इसके अलावा चीन और जापान में इस प्रतीक का धार्मिक महत्व है. स्वास्तिक सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. पुरातत्व खुदाइयों में यह चिन्ह यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और एशिया की प्राचीन सभ्यताओं में भी पाया गया है. प्राचीन ग्रीक और रोमन संस्कृति में यह सजावटी तत्व था, जबकि अमेरिकी आदिवासी जनजातियां इसे अपनी परंपराओं में शामिल करती थीं. लेकिन इतिहास के कुछ पन्नों ने इस चिन्ह के मायने बदल दिए. हालांकि भारत में आज भी इसे शुभ का संकेत ही माना जाता है.