वैज्ञानिकों ने बनाया पानी में चिपकने वाला गोंद, 10 सेकेंड में करेगा कमाल, बार-बार कर सकेंगे इस्तेमाल
वैज्ञानिकों ने ऐसा नया अंडरवाटर एडहेसिव विकसित किया है, जो पानी के भीतर कुछ सेकंड में मजबूत पकड़ बनाता है, वर्षों टिकता है और बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है.
रोजमर्रा की जिंदगी में जूते से लेकर फर्नीचर तक हर जगह एडहेसिव का इस्तेमाल होता है, लेकिन पानी के भीतर इसकी क्षमता तेजी से घट जाती है. इसकी मुख्य वजह सतह पर बनने वाली पानी की बेहद पतली परत है, जो गोंद और सतह के बीच मजबूत संपर्क बनने से रोकती है. लंबे समय तक पानी में रहने पर गोंद धीरे-धीरे कमजोर होकर निकल भी सकता है.
वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका
शोधकर्ताओं ने इस समस्या के लिए ‘BP16TPB’ नाम के एक supramolecular ionic liquid पर आधारित नया एडहेसिव तैयार किया है. इसे dimethyl sulfoxide नामक सॉल्वेंट में घोलकर इस्तेमाल किया गया. पानी के संपर्क में आते ही इसके अणु खुद को पुनर्गठित करते हैं और एक ज्यादा स्थिर संरचना बना लेते हैं. इस प्रक्रिया को solvent exchange-mediated self-assembly कहा गया है.
पानी को हटाकर बनाता है मजबूत जोड़
नए पदार्थ की खासियत यह है कि यह पानी की मौजूदगी को बाधा बनाने के बजाय उसी वातावरण में अपनी पकड़ मजबूत करता है. अणुओं के बीच हाइड्रोजन बॉन्ड और pi stacking जैसी अंतःक्रियाएं संरचना को मजबूती देती हैं. इसके साथ Marangoni effect भी काम करता है, जो सतह से पानी की बाधा को हटाने में मदद करता है.
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सिर्फ 10 सेकंड में मजबूत पकड़
Nature Communications में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ताओं ने इस एडहेसिव को सिरेमिक, एपॉक्सी और प्लास्टिक जैसी विभिन्न सतहों पर पानी के भीतर परखा. महज 10 सेकंड में इसकी चिपकने की ताकत करीब 1.1 मेगापास्कल तक पहुंच गई. यह प्रदर्शन पारंपरिक अंडरवाटर एडहेसिव की तुलना में काफी बेहतर बताया गया है.
तीन साल तक नहीं छोड़ा साथ
प्रयोग के दौरान एडहेसिव से जुड़े नमूने ने पानी के भीतर लगातार तीन साल से अधिक समय तक 2 किलोग्राम वजन संभाले रखा. शोधकर्ताओं के मुताबिक यह परिणाम दिखाता है कि सामग्री लंबे समय तक पानी के कारण होने वाली खराबी और संरचनात्मक बदलाव का सामना कर सकती है.
बार-बार निकालें और फिर चिपकाएं
इसकी एक और खासियत इसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकना है. परीक्षण में वैज्ञानिकों ने इसे पानी के भीतर आठ बार अलग करके फिर से जोड़ा और हर चक्र में इसकी पकड़ बरकरार रही. यह अम्लीय, क्षारीय और खारे पानी में भी काम करता रहा, हालांकि 70 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर इसकी प्रभावशीलता घट गई.
समुद्र के नीचे मरम्मत में आएगा काम
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक पानी के भीतर पाइपलाइन, समुद्री सेंसर और अन्य उपकरणों की मरम्मत में उपयोगी हो सकती है. यदि इसे बड़े स्तर पर विकसित किया जा सका, तो यह अंडरवाटर निर्माण और रखरखाव के लिए एक नई तकनीकी राह खोल सकती है.