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'स्कूल की ड्रेस में शूट न हों पोर्न फिल्म', छात्राओं ने क्यों उठाई मांग?

ब्रिटेन में ऑक्सफोर्डशायर की किशोरियां पोर्नोग्राफी में स्कूल यूनिफॉर्म के इस्तेमाल पर प्रतिबंध चाहती हैं. उनका कहना है कि इससे बच्चों का सैक्सचुलाइजेशन सामान्य होता है और छात्राएं असुरक्षित महसूस करती हैं.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
'स्कूल की ड्रेस में शूट न हों पोर्न फिल्म', छात्राओं ने क्यों उठाई मांग?
Courtesy: pinterest

ब्रिटेन के ऑक्सफोर्डशायर में स्कूली छात्राओं के एक समूह ने पोर्नोग्राफी में स्कूल यूनिफॉर्म के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. बिसेस्टर स्थित द कूपर स्कूल की इन छात्राओं ने इसके लिए एक ऑनलाइन याचिका शुरू की है. उनका कहना है कि स्कूल की ड्रेस को अश्लील सामग्री में इस्तेमाल करना बच्चों और किशोरों को यौन नजरिए से पेश करने का उदाहरण है. याचिका पर अब तक 26 हजार से अधिक हस्ताक्षर हो चुके हैं.

‘हम बच्चे हैं, कोई वस्तु नहीं’

इस अभियान से जुड़ी 15 वर्षीय आयलिन का कहना है कि स्कूल यूनिफॉर्म किसी शैक्षणिक समुदाय और साझा पहचान का प्रतीक होती है, लेकिन उसका यौनकरण इस अर्थ को बिगाड़ रहा है. वह स्कूल के ‘लिटिल फेमिनिस्ट बुक क्लब’ की सदस्य हैं, जहां छात्राओं ने इस मुद्दे पर अभियान शुरू करने का फैसला किया.

14 वर्षीय विलो ने बताया कि वह सार्वजनिक जगहों पर यूनिफॉर्म पहनने से बचती हैं और घर पहुंचकर कपड़े बदल लेती हैं, क्योंकि उन्हें असुरक्षित महसूस होता है. 15 वर्षीय मे भी कहती हैं कि यूनिफॉर्म पहनकर सड़क पर निकलने में उन्हें डर लगता है.

टीवी और मीडिया की छवि पर भी सवाल

छात्राओं का कहना है कि समस्या केवल पोर्नोग्राफी तक सीमित नहीं है. मीडिया और मनोरंजन की कुछ प्रस्तुतियों में भी स्कूल यूनिफॉर्म को यौन आकर्षण से जोड़कर दिखाया जाता है. मे ने बताया कि जब वह 12 साल की थीं, तब एक टीवी ड्रामा में उन्होंने लगभग 30 वर्ष की महिला को पुरुष को प्रभावित करने के लिए ‘सेक्सी कैथोलिक स्कूलगर्ल’ पोशाक पहने देखा था. इस दृश्य ने उन्हें असहज किया, क्योंकि अगले दिन उन्हें भी स्कूल यूनिफॉर्म पहननी थी. उनके अनुसार, ऐसी प्रस्तुतियां बच्चों की पहचान को गलत नजरिए से देखने की प्रवृत्ति बढ़ा सकती हैं.

सर्वे में सामने आई अवांछित यौन टिप्पणियों की समस्या

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था प्लान इंटरनेशनल यूके के 2018 के सर्वे में 1,004 लड़कियों को शामिल किया गया था. संस्था के अनुसार, 14 से 21 वर्ष की उम्र की 35 प्रतिशत प्रतिभागियों ने बताया कि सार्वजनिक जगहों पर स्कूल यूनिफॉर्म पहनने के दौरान उन्हें अवांछित यौन ध्यान का सामना करना पड़ा था. छात्रा मे के मुताबिक, याचिका शुरू होने के बाद सैकड़ों महिलाओं ने उनसे अपने अनुभव साझा किए. कई महिलाओं ने बताया कि बचपन में स्कूल यूनिफॉर्म पहनने के दौरान उन्हें यौन नजरिए से देखे जाने का अनुभव हुआ था.

कानून में बदलाव की मांग

छात्राओं ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम को भी पत्र लिखकर बदलाव की मांग की है. आयलिन का मानना है कि ऐसे प्रतिबंध से धीरे-धीरे बच्चों के यौनकरण को सामान्य मानने की प्रवृत्ति कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, स्कूल यूनिफॉर्म के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का उनका प्रस्ताव मौजूदा कानून से अलग मुद्दा है. अभियान का उद्देश्य ऐसी सामग्री के प्रसार और उससे बनने वाली सामाजिक छवि पर सवाल उठाना है.

कानून विशेषज्ञ ने बताया महत्वपूर्ण मुद्दा

डरहम विश्वविद्यालय में कानून की प्रोफेसर और Exposed: The Problem of Extreme Porn की लेखिका क्लेयर मैकग्लिन ने इस अभियान का समर्थन किया. उनके अनुसार, मुख्यधारा की पोर्नोग्राफी में स्कूल यूनिफॉर्म का इस्तेमाल किशोर लड़कियों को यौन रूप से पेश करने की समस्या को उजागर करता है. उन्होंने यह भी कहा कि किशोरों से जुड़ी पोर्नोग्राफिक सामग्री की श्रेणी का संबंध कभी-कभी अधिक हिंसक और आक्रामक सामग्री से भी होता है. मैकग्लिन ने कानून की सीमा की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि यदि कोई वयस्क खुद को 17 वर्ष का बताकर स्कूल यूनिफॉर्म में दिखता है, तो वह जरूरी नहीं कि प्रस्तावित कानूनी प्रावधान के दायरे में आए.

ब्रिटिश सरकार ने कानून सख्त करने की बात कही

पीड़ितों के हितों, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा से निपटने तथा अंतरराष्ट्रीय न्याय की जिम्मेदारी संभालने वाली मंत्री एलेक्स डेविस-जोन्स ने छात्राओं के अभियान की सराहना की. उन्होंने कहा कि लड़कियों को बड़े होते समय अपनी स्कूल यूनिफॉर्म का यौनकरण देखने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए. मंत्री के मुताबिक, सरकार ऐसे कानून में बदलाव कर रही है जिसके तहत किसी बच्चे की उम्र 16 वर्ष से कम दिखाने का नाटक करने वाले वयस्क को दर्शाने वाली पोर्नोग्राफी को अपने पास रखना या साझा करना जेल की सजा वाला अपराध बन सकेगा. हालांकि, खबर में बताया गया है कि अप्रैल में सहमति मिलने के बावजूद यह प्रावधान अभी लागू नहीं हुआ था. छात्राओं की मुहिम अब इस व्यापक बहस का हिस्सा बन गई है कि बच्चों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति और अश्लील सामग्री के नियमन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.