menu-icon
India Daily

पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच शांति क्यों चाहता है तुर्किये, तालिबान से क्या हैं कनेक्शन?

तुर्किये पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शांति बनाए रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है. एर्दोगन सरकार तालिबान से सहयोग बढ़ा रही है ताकि शरणार्थी संकट, क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक चुनौतियों को रोका जा सके.

auth-image
Edited By: Kanhaiya Kumar Jha
Pakistan Afghanistan & Turkey India Daily
Courtesy: Gemini AI

नई दिल्ली: तुर्किये इन दिनों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच शांति कायम रखने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है. राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन नहीं चाहते कि दोनों देशों के बीच जारी संघर्षविराम टूटे. इसी उद्देश्य से तुर्किये ने अफगानिस्तान में तालिबान के साथ खुले तौर पर सहयोग शुरू कर दिया है.

एर्दोगन ने हाल ही में कहा कि इस हफ्ते तुर्किये के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और खुफिया एजेंसी के प्रमुख पाकिस्तान जाएंगे. वहां वे अफगानिस्तान से जुड़ी वार्ताओं पर चर्चा करेंगे ताकि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखी जा सके.

अब सवाल उठता है कि तुर्किये दोनों देशों के बीच टकराव क्यों नहीं चाहता? आइए इसके पीछे की वजहें जानते हैं:-

शरणार्थियों की बढ़ती समस्या

तुर्किये पहले से ही बड़ी संख्या में अफगान और सीरियाई शरणार्थियों को अपने यहां शरण दे रहा है. अगर अफगानिस्तान में संघर्ष बढ़ा या तालिबान के खिलाफ लड़ाई तेज हुई, तो नए शरणार्थियों की लहर तुर्किये और यूरोप दोनों के लिए परेशानी बन सकती है. इसी वजह से तुर्किये चाहता है कि अफगानिस्तान स्थिर रहे और लोग पलायन न करें.

आर्थिक और मानवीय सहयोग से प्रभाव बढ़ाना

तुर्किये अफगानिस्तान में स्कूल, अस्पताल और बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद कर रहा है. इससे वहां की जनता को राहत मिलती है और तुर्किये का प्रभाव भी बढ़ता है. साथ ही, तुर्की की कंपनियों को अफगानिस्तान में निवेश और व्यापार के नए अवसर मिल सकते हैं. यह कदम मानवीय सहायता के साथ-साथ आर्थिक रणनीति का भी हिस्सा है.

अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करने की कोशिश

तुर्किये ने भले ही तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उसके साथ संवाद और सहयोग बनाए रखा है. अंकारा खुद को मुस्लिम दुनिया और यूरोप के बीच एक संतुलित पुल के रूप में पेश करना चाहता है.

इस भूमिका से वह दिखाना चाहता है कि वह संकटग्रस्त इलाकों में भी प्रभावशाली और भरोसेमंद देश है. इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत होती है और वह नाटो तथा यूरोपीय देशों के बीच अपनी भूमिका को और स्पष्ट कर पाता है.

काबुल हवाई अड्डे का संचालन

तुर्किये ने तालिबान के साथ समझौता करके काबुल हवाई अड्डे का प्रबंधन अपने हाथ में लिया है. यह हवाई अड्डा अफगानिस्तान का अंतरराष्ट्रीय द्वार माना जाता है. इसे चलाकर तुर्किये न सिर्फ वहां अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रख रहा है, बल्कि खुद को एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में भी स्थापित कर रहा है.

जोखिम भी कम नहीं हैं

हालाँकि यह नीति तुर्किये के लिए फायदेमंद है, लेकिन कुछ जोखिम भी हैं. तालिबान की मानवाधिकार स्थिति, महिलाओं की शिक्षा पर रोक और राजनीतिक अस्थिरता तुर्किये की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है. साथ ही, पश्चिमी देशों से उस पर राजनैतिक दबाव बढ़ सकता है.