होर्मुज का वो इतिहास जब ईरान नहीं, इस देश का था कब्जा, जहाजों से वसूला जाता था भारी टैक्स
ईरान-इजरायल युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा संकट बन गया है. 25 प्रतिशत कच्चे तेल का केंद्र रहे इस मार्ग का इतिहास पुर्तगाली कब्जे, भारी टैक्स और सफाविद गठबंधन की रोमांचक कहानियों से भरा है.
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने आज पूरी दुनिया की नजरें 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर टिका दी हैं. यह संकरा जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की जीवन रेखा माना जाता है. वर्तमान में इस पर ईरान का प्रभुत्व है, लेकिन इतिहास के पन्ने बताते हैं कि यह हमेशा से ऐसा नहीं था. एक समय था जब यह मार्ग पुर्तगाली साम्राज्य के अधीन था. आइए जानते हैं उस दौर के बारे में जब इस रणनीतिक रास्ते पर नियंत्रण के लिए साम्राज्य आपस में टकराते थे.
मौजूदा युद्ध की वजह से होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बाधित होने से दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा गया है. दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग एक चौथाई हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है. इसके बंद होने का सीधा असर सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देशों की सप्लाई पर पड़ा है. भारत सहित कई देशों के तेल टैंकर समुद्र में फंस गए हैं. जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतें अनियंत्रित होने का खतरा पैदा हो गया है.
पुर्तगाली कब्जा और सामरिक चाल
होर्मुज पर आज भले ही ईरान का दावा सबसे मजबूत हो, लेकिन 1507 में स्थिति बिल्कुल अलग थी. पुर्तगाली खोजकर्ता जब भारत का समुद्री रास्ता तलाश रहे थे, तब वे अफ्रीका का चक्कर लगाते हुए फारस की खाड़ी तक जा पहुंचे. उन्होंने होर्मुज जैसे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण द्वीप की रणनीतिक अहमियत को पहचाना और उस पर कब्जा कर लिया. उस समय इस क्षेत्र में न तो ईरान का दबदबा था और न ही किसी अन्य आधुनिक महाशक्ति का वहां कोई प्रभाव था.
समुद्री टैक्स और 'कार्टाजा' की दमनकारी व्यवस्था
द्वीप पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद पुर्तगालियों ने वहां एक मजबूत किला और सीमा शुल्क घर बनाया. उन्होंने 'कार्टाजा' नामक एक व्यवस्था शुरू की, जो एक तरह का सशुल्क व्यापार लाइसेंस था. रेशम, मसाले, अरबी घोड़े और मोतियों का व्यापार करने वाले जहाजों को इस मार्ग से गुजरने के लिए भारी टैक्स देना पड़ता था. इतिहासकार रुडोल्फ मैथी के अनुसार, पुर्तगालियों की ये नीतियां बहुत दमनकारी थीं, जिसके कारण स्थानीय व्यापारियों और क्षेत्रीय शक्तियों में उनके प्रति भारी आक्रोश पनपने लगा था.
शाह अब्बास प्रथम और सफाविद राजवंश का उदय
पुर्तगालियों का यह वर्चस्व लगभग एक शताब्दी तक चला, लेकिन 17वीं सदी में फारस के सफाविद राजवंश ने इसे चुनौती दी. शाह अब्बास प्रथम, जो एक शक्तिशाली शासक थे, उन्होंने पुर्तगालियों को खदेड़ने की योजना बनाई. उन्हें पता था कि पुर्तगालियों की नौसैनिक शक्ति का मुकाबला अकेले करना कठिन होगा. इसलिए उन्होंने कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक रणनीतिक गठबंधन किया. इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पुर्तगालियों के समुद्री एकाधिकार को पूरी तरह खत्म करना था.
अंग्रेजों के साथ गठबंधन और पुर्तगालियों की विदाई
साल 1622 में सफाविदों और ब्रिटिश नौसेना ने मिलकर पुर्तगालियों पर बड़ा हमला किया. अंग्रेजों ने अपनी अत्याधुनिक नौसैनिक शक्ति का उपयोग किया, जिसके बदले में उन्हें शाह अब्बास से व्यापारिक रियायतें मिलीं. इस युद्ध के बाद पुर्तगालियों को होर्मुज छोड़कर भागना पड़ा. यह जीत ऐतिहासिक थी क्योंकि इसने होर्मुज पर फारस का नियंत्रण बहाल किया. आज वही पुराना संघर्ष नए चेहरों के साथ फिर से होर्मुज के पानी में गूंज रहा है, जहां नियंत्रण की लड़ाई वैश्विक राजनीति का केंद्र बनी हुई है.