पहली बार इस देश के खिलाफ युद्ध में उतरा था टैंक, तब से बदल गया जंग का तरीका; जानें पूरी कहानी
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने सोम्मे की लड़ाई में पहली बार टैंकों का इस्तेमाल किया था. शुरुआती टैंक भले ही पूरी तरह सफल नहीं रहे, लेकिन इस प्रयोग ने आधुनिक युद्ध की दिशा बदल दी.
प्रथम विश्व युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर जंग का बड़ा हिस्सा खाइयों में लड़ा जा रहा था. सैनिक लंबी और गहरी खाइयों में छिपकर हमला करते थे, जबकि इनके बीच का खुला इलाका 'नो मैन्स लैंड' कहलाता था. यहां जर्मन सेना ने भारी मशीनगनें तैनात कर रखी थीं.
खुले मैदान में पैदल सैनिकों का आगे बढ़ना बेहद मुश्किल और जानलेवा था. इसी समस्या का समाधान तलाशते हुए ब्रिटेन ने ऐसी बख्तरबंद मशीन तैयार की, जो सैनिकों को सुरक्षा देते हुए दुश्मन की रक्षात्मक लाइन तक पहुंच सके.
15 सितंबर 1916 को पहली बार इस्तेमाल
15 सितंबर 1916 को ब्रिटिश सेना ने सोम्मे की लड़ाई के दौरान करीब 40 शुरुआती टैंकों को जर्मन मोर्चे की ओर भेजा. इनमें से कुछ टैंक जर्मन रक्षा पंक्ति के अंदर एक मील से ज्यादा दूरी तक पहुंचने में सफल रहे. हालांकि, उस दौर के टैंक आज की तरह तेज और आधुनिक नहीं थे. उनकी गति काफी कम थी और तकनीकी खराबियां भी आम थीं. कई टैंक रास्ते में ही बंद हो गए. कुछ टैंक जर्मन जवाबी हमले के सामने अपनी बढ़त कायम नहीं रख सके. इसके बावजूद ब्रिटिश कमांडर जनरल डगलस हेग को इस तकनीक में भविष्य की बड़ी संभावना दिखाई दी. उन्होंने अधिक संख्या में टैंक बनाने का आदेश दिया.
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सोम्मे की लड़ाई में भारी तबाही
टैंकों के इस्तेमाल से पहले ही सोम्मे की लड़ाई में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हो चुका था. 1 जुलाई 1916 को बड़े हमले के दौरान करीब एक लाख ब्रिटिश सैनिक जर्मन मोर्चे की ओर बढ़े थे. लेकिन जर्मन मशीनगनों के सामने यह हमला बेहद महंगा साबित हुआ. पहले ही दिन करीब 20 हजार ब्रिटिश सैनिक मारे गए और लगभग 40 हजार घायल हुए. इसके बाद भी महीनों तक संघर्ष जारी रहा. भारी बारिश के कारण अक्टूबर तक युद्धक्षेत्र कीचड़ में बदल गया और सैनिकों के साथ सैन्य वाहनों की आवाजाही भी कठिन हो गई.
प्रयोग असफल लेकिन इतिहास बदला
18 नवंबर 1916 को सोम्मे का अभियान समाप्त हुआ. इस लंबी लड़ाई में मित्र देशों और जर्मनी, दोनों को भारी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा. टैंक तत्काल युद्ध का रुख नहीं बदल सके, लेकिन उनका इस्तेमाल भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. इसके बाद टैंक तकनीक में तेजी से सुधार हुआ. उनकी गति, हथियार और सुरक्षा क्षमता बढ़ती गई. द्वितीय विश्व युद्ध तक टैंक आधुनिक युद्ध का एक अहम हथियार बन चुके थे. इस तरह 15 सितंबर 1916 को सोम्मे के मैदान में हुई पहली टैंक तैनाती ने सैन्य इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत कर दी.