UNSC में रूस ने किया भारत का समर्थन, जर्मनी-जापान की दावेदारी पर लावरोव ने उठाए सवाल

संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत की स्थायी सदस्यता की खुलकर पैरोकारी की. साथ ही उन्होंने जर्मनी और जापान को स्थायी सीट देने का कड़ा विरोध किया.

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Reepu Kumari

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग एक बार फिर तेज हो गई है. रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया. उन्होंने साफ कहा कि पश्चिमी देशों, खासकर जर्मनी और जापान को कोई नई स्थायी सीट नहीं दी जानी चाहिए. लावरोव ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया.

जर्मनी-जापान पर लावरोव का सीधा हमला

लावरोव ने अपने संबोधन में कहा कि सुरक्षा परिषद के सुधार में पश्चिमी देशों को कोई अतिरिक्त सीट नहीं दी जानी चाहिए, खासतौर पर जर्मनी और जापान को, जिन्हें उन्होंने सैन्यवाद और पुरानी नीतियों की तरफ बढ़ता हुआ बताया. उन्होंने कहा कि रूस भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है, ताकि सुरक्षा परिषद वास्तव में दुनिया की मौजूदा तस्वीर को दिखा सके.

अन्य देशों ने भी की भारत की तारीफ

भारत की दावेदारी को महासभा में कई अन्य देशों का भी साथ मिला. मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल ने कहा कि भारत वैश्विक मामलों में अपनी रचनात्मक भूमिका के चलते स्थायी सीट का हकदार है. पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने भी अफ्रीका, ब्राजील और भारत को स्थायी प्रतिनिधित्व देने की मांग दोहराई.


जापान और अफ्रीकी देशों ने भी उठाई आवाज

मार्शल आइलैंड्स ने जापान और उसके जी4 साझेदारों की स्थायी सदस्यता का समर्थन जारी रखा. वहीं जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने परिषद को मौजूदा वैश्विक हकीकत के अनुरूप बदलने की अपील की. सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने कहा कि परिषद अब भी 1945 की दुनिया को दर्शाती है, जबकि अफ्रीका की आबादी 1.6 अरब से ज्यादा होने के बावजूद उसे कोई स्थायी सीट नहीं मिली है.

दो-तिहाई बहुमत के बिना नहीं बदलेगा चार्टर

फिलहाल सुरक्षा परिषद में चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका स्थायी सदस्य हैं और इन्हीं के पास वीटो पावर है, जबकि 10 अस्थायी सदस्य दो साल के लिए चुने जाते हैं. संयुक्त राष्ट्र चार्टर में किसी भी बदलाव के लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत और सभी पांच स्थायी सदस्यों समेत दो-तिहाई सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी है, जो इस सुधार को आसान नहीं बनाता.