पाकिस्तान के होंगे टुकड़े? मंत्री ने ही कर दी देश को 16 हिस्सों में बांटने मांग
पाकिस्तान में छोटे प्रांत बनाने की योजना फिर चर्चा में है. अलीम खान ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को 12-16 प्रांतों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक विवाद तेज हो सकते हैं.
नई दिल्ली: पाकिस्तान में प्रशासनिक सुधारों के नाम पर छोटे प्रांत बनाने का मुद्दा फिर गरमाया है. संघीय संचार मंत्री अलीम खान ने देश की जनता को आश्वस्त किया कि बड़े प्रांतों को विभाजित करने से शासन बेहतर होगा और विकास सीधे लोगों तक पहुंचेगा. हालांकि, राजनीतिक पार्टियां और विशेषज्ञ इस योजना को विवादास्पद और खतरनाक मान रहे हैं. छोटे प्रांत बनाने से सत्ता संतुलन, सांस्कृतिक पहचान और अलगाववादी आंदोलनों पर असर पड़ने की आशंका है.
क्या है विभाजन का प्लान?
अलीम खान के अनुसार, पाकिस्तान के चार मुख्य प्रांत- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को तीन-चार प्रशासनिक इकाइयों में बांटा जाएगा. इससे कुल 12 से 16 प्रांत बन सकते हैं. सरकार का तर्क है कि बड़े प्रांतों में दूरदराज के क्षेत्रों तक प्रशासन और विकास के लाभ नहीं पहुंच पाते. छोटे प्रांत जनता को स्थानीय स्तर पर सरकारी सेवाएं और प्रशासनिक सुविधा देंगे.
राजनीतिक समर्थन और विरोध
इस प्रस्ताव ने पाकिस्तानी गठबंधन सरकार में दरार पैदा कर दी है. शहबाज शरीफ की सरकार में IPP और MQM-P इस योजना के प्रबल समर्थक हैं. वहीं, पीपुल्स पार्टी और सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह इस प्रस्ताव के विरोधी हैं. बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के राष्ट्रवादी संगठन भी इसे उनकी सांस्कृतिक पहचान को खतरा मान रहे हैं.
प्रशासनिक विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञ मानते हैं कि नए प्रांत बनाने से प्रशासनिक समस्याएं कम नहीं होंगी. पूर्व पुलिस प्रमुख सैयद अख्तर अली शाह का कहना है कि पाकिस्तान में समस्या प्रांतों की संख्या नहीं, बल्कि कमजोर संस्थाएं और जवाबदेही की कमी है. पीआईएलडीएटी प्रमुख अहमद बिलाल महबूब ने भी चेतावनी दी कि यह बेहद खर्चीला और जटिल काम है, जो पहले से चल रही समस्याओं को और बढ़ा सकता है.
ऐतिहासिक संदर्भ
1947 में पाकिस्तान में पांच प्रांत थे- पूर्वी बंगाल, पश्चिम पंजाब, सिंध, NWFP और बलूचिस्तान. 1971 में पूर्वी बंगाल अलग होकर बांग्लादेश बन गया. विशेषज्ञों का कहना है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से जारी अलगाववादी आंदोलनों के बीच नए प्रांत बनाना संकट और बढ़ा सकता है.
समाधान नहीं, नई मुसीबत
विशेषज्ञों का तर्क है कि नए प्रांत बनाने से सियासी और सामाजिक तनाव बढ़ सकते हैं. बिना बुनियादी सुधारों के विभाजन से प्रशासनिक जटिलताएं, आर्थिक बोझ और अलगाववाद जैसी समस्याएं और गंभीर हो जाएंगी. ऐसे में यह कदम पाकिस्तान के लिए फायदे की बजाय नुकसानदेह साबित हो सकता है.