पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ एक बार फिर अपने पुराने बयान और नए फैसले को लेकर सवालों के घेरे में हैं. वजह ये है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई पहल ‘Board of Peace’ पर शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. बोर्ड ऑफ पीस पर हस्ताक्षर करने को लेकर शरीफ की अपने ही देश में किरकिरी हो रही है. ऐसा इसलिए है क्योंकि मिडिल ईस्ट पीस प्लान को शहबाज शरीफ ने 2020 में खुलकर “अन्यायपूर्ण और पक्षपाती” बताया था.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में Board of Peace की शुरुआत की. इसका मकसद गाजा में सीजफायर, पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता को बढ़ावा देना बताया गया है. ट्रंप का कहना है कि यह बोर्ड वैश्विक स्तर पर भी शांति को बहाल करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. पाकिस्तान ने इसे स्थायी युद्धविराम और फिलिस्तीनियों की मदद के तौर पर देखा है.
2020 में जब ट्रंप की Peace to Prosperity Plan आई थी, तब शहबाज शरीफ पाकिस्तान की संसद में विपक्ष के नेता थे. उस समय उन्होंने इस योजना को “अन्यायपूर्ण, एकतरफा और दमनकारी” कहा था. उन्होंने यह भी कहा था कि यह योजना यरुशलम और अवैध यहूदी बस्तियों पर इजरायल के कब्जे को सही ठहराती है.
पाकिस्तान के भीतर इस फैसले पर जबरदस्त नाराजगी देखी जा रही है. इमरान खान की पार्टी PTI ने कहा कि इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहल में शामिल होने से पहले संसद और सभी राजनीतिक दलों से सलाह ली जानी चाहिए थी. पार्टी ने सरकार से इस बोर्ड से दूरी बनाने की मांग की है.
वरिष्ठ पत्रकार जाहिद हुसैन ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान सिर्फ “ट्रंप की नजरों में अच्छा” दिखना चाहता है. लेखिका फातिमा भुट्टो ने इसे फिलिस्तीन के साथ विश्वासघात बताया. वहीं कई एक्टिविस्टों ने कहा कि यह फैसला न संसद में चर्चा के लिए आया और न ही मीडिया में.