पैदा होते ही सर पर चढ़ेगा 3.33 लाख का कर्ज! कंगाली की राह पर तेजी से बढ़ रहा पाकिस्तान

कंगाली की राह पर पाकिस्तान काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इस देश में पैदा होते ही हर एक बच्चे पर 333,000 रुपये का बोझ चढ़ने लगा है. 

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Shanu Sharma

नई दिल्ली: पाकिस्तान का दिन हाल और भी ज्यादा बिगड़ता जा रहा है. पड़ोसी मुल्क पर आर्थिक बोझ बढ़ता ही जा रहा है. पाकिस्तान के हर एक नागरिक पर पिछले साल में 13 प्रतिशत का बोझ बढ़ गया है. यानी अब पाकिस्तान में पैदा होने वाले हर एक पाकिस्तानी पर लगभग 333,000 रुपये का बोझ है. 

पाकिस्तान का बजट घाटा अब 3 ट्रिलियन रुपये से भी ज्यादा हो चुका है. इसी वजह से पाकिस्तान को अपने लिए कई जगहों से कर्ज लेने की जरूरत पड़ रही है. लेकिन इसके बाद भी पाकिस्तान लड़ाई लड़ने में बिल्कुल पीछे नहीं हटता और अपने देश की जनता के लिए परेशानी और भी ज्यादा बढ़ाता है. 

राजकोषीय नीति रिपोर्ट में हुआ खुलासा

पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए वार्षिक राजकोषीय नीति रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रति व्यक्ति कर्ज वित्तीय वर्ष 2023-24 में 2,94,098 रुपये था जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में बढ़कर 3,33,041 रुपये तक गया है. यानी हर व्यक्ति पर एक साल में लगभग 40 हजार रूपये का बोझ बढ़ा है.

सरकार के कर्ज का बोझ हर उम्र के व्यक्ति पर चढ़ रहा है. देश की आर्थिक स्थित बहुत ही ज्यादा खराब हो चुकी है. रिपोर्ट के मुताबिक 2024 से 2025 के बीच पाकिस्तान का कुल सार्वजनिक कर्ज 71.2 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर 80.5 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच चुका है. यानी एक साल में लगभग 9.3 ट्रिलियन रुपये का अतिरिक्त कर्ज बढ़ गया. वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण उच्च ब्याज भुगतान है, जो पहले के कर्ज को घटाने के बजाए बढ़ा सकते हैं. 

बिना रोक टोक के पाकिस्तानी सरकार उठा रहे कर्ज

राजकोषीय नीति विवरण के अनुसार सरकार को और भी ज्यादा उधार लेने की जरूरत पड़ रही है. पाकिस्तान की वित्तीय जवाबदेही व्यवस्था पर अब सवाल उठने लगे हैं. अमेरिका जैसे देश का उदाहरण दिया जा रहा है. कहा जा रहा कि अगर वहां कर्ज सीमा तक पहुंच जाता है तो सरकारी कामकाज तब तक ठप हो जाता है जब तक उस सीमा को संशोधित नहीं किया जाए. वहीं पाकिस्तान में संसद को केवल कर्ज की जानकारी दी जाती है और फिर सरकार बिना प्रभावी रोक-टोक के नया कर्ज ले लेती है. जिसकी वजह से वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कर्ज और ब्याज का रफ्तार कम नहीं हुआ तो आर्थिक स्थिरता गंभीर हो सकती है.