एक ब्राजीलियाई पत्रकार ने सनसनीखेज दावा करते हुए कहा है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मोसाद को पाकिस्तान सेना प्रमुख असीम मुनीर की स्विटजरलैंड में हत्या करने का आदेश दिया था. हालांकि पाकिस्तान के अधिकारियों ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे कल्पना पर आधारित कहानी बताया है. .
यह दावा ब्राजील के पत्रकार पेपे एस्कोबार ने एक पॉडकास्ट कार्यक्रम के दौरान किया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था को कथित रूप से ऐसी जानकारी मिली थी, जिसमें प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाए जाने की बात कही गई थी. इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय हलकों में चर्चा तेज हो गई. हालांकि पत्रकार ने अपने दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया, जिससे इसकी विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठने लगे.
🇵🇰🇮🇱 A peace negotiation in Switzerland allegedly came within inches of becoming an international assassination crisis.
— Mario Nawfal (@MarioNawfal) June 24, 2026
Geopolitical analyst Pepe Escobar claims Pakistani military intelligence intercepted a Mossad plan to assassinate Army Chief Asim Munir during the talks, then… https://t.co/JWyHzH7hoT pic.twitter.com/oXOJs1i5e8
पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस पूरे मामले को तुरंत खारिज कर दिया. सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा गया कि यह दावा वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता. अधिकारियों के अनुसार स्विट्जरलैंड दौरे के दौरान किसी प्रकार का सुरक्षा संकट या विशेष चेतावनी सामने नहीं आई थी. उन्होंने कहा कि प्रतिनिधिमंडल की यात्रा सामान्य और सुरक्षित तरीके से संपन्न हुई और किसी भी सुरक्षा एजेंसी ने ऐसी आशंका व्यक्त नहीं की.
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया जब स्विट्जरलैंड में विभिन्न देशों के प्रतिनिधिमंडल महत्वपूर्ण क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा कर रहे थे. पश्चिम एशिया की स्थिति, सुरक्षा चुनौतियां और कूटनीतिक प्रयास इन बैठकों के प्रमुख विषय रहे. ऐसे माहौल में सामने आए इस दावे ने अनावश्यक अटकलों को जन्म दिया और कई लोगों का ध्यान बातचीत के मूल मुद्दों से हटाकर विवाद की ओर मोड़ दिया.
फिलहाल इस दावे को लेकर किसी आधिकारिक जांच या अंतरराष्ट्रीय पुष्टि की जानकारी सामने नहीं आई है. पाकिस्तान की ओर से इसे पूरी तरह खारिज किए जाने के बाद मामला मुख्य रूप से बयानबाजी तक सीमित दिखाई देता है. हालांकि इस प्रकरण ने यह जरूर दिखाया है कि संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में किए गए दावे कितनी तेजी से वैश्विक चर्चा का विषय बन सकते हैं और कूटनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं.