'काम का दबाव बना देगा गे', मलेशियाई मंत्री के जॉब स्ट्रेस को लेकर दिए गए बयान पर मचा बवाल
मलेशिया में धार्मिक मामलों के मंत्री के एक बयान ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी. उन्होंने कार्यस्थल के तनाव को LGBT जीवनशैली से जोड़ने की बात कही, जिस पर लोगों ने सवाल उठाए और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाएं दीं.
नई दिल्ली: मलेशिया की राजनीति और समाज में उस समय नई बहस शुरू हो गई, जब प्रधानमंत्री कार्यालय में धार्मिक मामलों के मंत्री डॉ जुल्किफली हसन ने LGBT जीवनशैली को लेकर एक विवादित टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि कामकाजी तनाव उन कारणों में शामिल हो सकता है, जो लोगों को LGBT जीवनशैली की ओर ले जाते हैं. संसद में दिए गए इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई और लोगों ने तर्क, व्यंग्य और सवालों के जरिए इसका विरोध किया.
डॉ जुल्किफली हसन ने यह बयान संसद में एक प्रश्न के उत्तर में दिया. यह सवाल सांसद दातुक सिटी जैलाह मोहद यूसुफ ने पूछा था. उन्होंने मलेशिया में LGBT से जुड़े रुझानों, उम्र, नस्ल और इसके पीछे के कारणों पर अद्यतन जानकारी मांगी थी. मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार के पास देश में LGBT आबादी को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इसके बावजूद उन्होंने कुछ शोध अध्ययनों का हवाला देकर संभावित कारणों की चर्चा की.
2017 के अध्ययन का हवाला
मंत्री ने अपने जवाब में वर्ष 2017 में सुलैमान और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि इस अध्ययन के अनुसार LGBT व्यवहार के पीछे कई कारक हो सकते हैं. इनमें सामाजिक प्रभाव, व्यक्तिगत यौन अनुभव, काम से जुड़ा तनाव और अन्य निजी परिस्थितियां शामिल हैं. डॉ जुल्किफली ने यह भी जोड़ा कि धार्मिक आचरण की कमी भी ऐसे व्यवहार को प्रभावित कर सकती है. इन टिप्पणियों ने ही विवाद को जन्म दिया.
मलेशिया में LGBT पर कानून
मलेशिया में समलैंगिक संबंध अब भी कानूनन अपराध की श्रेणी में आते हैं. संघीय दंड संहिता 1936 के तहत प्रकृति के विरुद्ध यौन संबंध और अश्लील कृत्य प्रतिबंधित हैं. दोषी पाए जाने पर 20 साल तक की जेल और कोड़े मारने जैसी सजा का प्रावधान है. यह कानून पुरुषों और महिलाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है. इसी सख्त कानूनी पृष्ठभूमि में मंत्री का बयान और अधिक संवेदनशील बन गया.
सोशल मीडिया पर उड़ी खिल्ली
डॉ जुल्किफली की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आईं. रेडिट पर एक यूजर ने मजाक में लिखा कि अगर ऐसा है तो न्यूनतम वेतन बढ़ा दिया जाए और रहने की लागत घटा दी जाए. एक अन्य ने कहा कि इस तर्क से तो पूरा दफ्तर अब तक समलैंगिक हो जाना चाहिए था. कई लोगों ने चार दिन के कार्य सप्ताह की मांग को समाधान के रूप में पेश किया.
बहस और सवाल अब भी जारी
कई सोशल मीडिया यूजर्स ने मंत्री के बयान की तार्किकता पर सवाल उठाए. कुछ ने कहा कि समलैंगिकता किसी आधुनिक दबाव का नतीजा नहीं, बल्कि सदियों से समाज का हिस्सा रही है. वहीं कुछ लोगों ने व्यंग्य के जरिए सरकार से मजदूरी बढ़ाने और काम का दबाव घटाने की मांग रखी. यह बहस अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं रही, बल्कि कार्य संस्कृति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी सोच पर भी सवाल खड़े कर रही है.