इजरायल में 27 अक्टूबर को 120 सदस्यीय नेसेट (संसद) के चुनाव के लिए मतदान हो रहा है. नई दिल्ली इस चुनावी मुकाबले पर बारीकी से नजर बनाए हुए है, क्योंकि इसके परिणाम भारत की रक्षा आपूर्ति, द्विपक्षीय व्यापार, तकनीकी सहयोग और पूरे पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में कूटनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं.
वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट (मध्यमार्गी यशर पार्टी के नेता) उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं. चूंकि किसी भी दल को अकेले बहुमत (61 सीटें) मिलने का अनुमान नहीं है, इसलिए गठबंधन की राजनीति नई सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका निभाएगी.
फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को "शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी" का दर्जा दिया था. अब भारत यह देखना चाहता है कि नई नेतृत्व वाली सरकार उन प्रतिबद्धताओं को कैसे आगे बढ़ाती है.
रक्षा साझेदारी भारत-इजरायल संबंधों का सबसे मजबूत स्तंभ है. दोनों देशों के बीच सैन्य उपकरण, हथियार प्रणाली, खुफिया जानकारी और उन्नत रक्षा तकनीकों का सह-विकास शामिल है. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इजरायली सैन्य सहायता ने भारत की परिचालन आवश्यकताओं को मजबूती दी थी. आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच भारत इजरायल के रक्षा निर्यात का सबसे बड़ा खरीदार (लगभग 34 प्रतिशत) रहा है. भारत वर्तमान में स्पाइस-1000 बम, रैम्पेज एयर-टू-सरफेस मिसाइल, एयर लोरा बैलिस्टिक मिसाइल और आइस ब्रेकर मिसाइल प्रणाली सहित लगभग 8.7 अरब डॉलर (78,217 करोड़ रुपए) के रक्षा सौदों पर काम कर रहा है.
मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (MP-IDSA) के अनुसार, दोनों देशों का ध्यान अब केवल रक्षा खरीद पर नहीं, बल्कि सह-उत्पादन और साइबर सुरक्षा तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर केंद्रित है. इसके अलावा, भारत का बहुस्तरीय वायु रक्षा तंत्र 'मिशन सुदर्शन चक्र' भी इस तकनीकी सहयोग से जुड़ा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत कूटनीति ने द्विपक्षीय संबंधों को एक नई ऊंचाई दी है. फरवरी की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एआई, साइबर सुरक्षा, कृषि, डिजिटल भुगतान और श्रम गतिशीलता (लेबर मोबिलिटी) पर 17 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे. चुनावों से ठीक पहले 22 अक्टूबर को भी दोनों नेताओं ने फोन पर बातचीत की थी. हालांकि, नई दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के संबंध किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल पर निर्भर नहीं हैं और सरकार बदलने से राज्य स्तर के संबंधों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा. विपक्ष के नेता गादी आइसेनकोट ने भी भारत को एक महत्वपूर्ण भागीदार माना है, जिससे नीतियों में निरंतरता की पूरी उम्मीद है.
आर्थिक मोर्चे पर भी भारत की नजरें इस चुनाव पर टिकी हैं. 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 3.5 अरब डॉलर को पार कर गया था. दोनों देश एक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर भी बातचीत कर रहे हैं. इसके अलावा, भारत के यूपीआई (UPI) को इजरायल के MASAV भुगतान प्रणाली से जोड़ने और कृषि में नवाचार बढ़ाने की योजनाएं शामिल हैं. भारत के 50,000 कुशल श्रमिकों को 5 वर्षों में इजरायल भेजने का समझौता भी हुआ है. यदि चुनाव के बाद सरकार गठन में लंबा समय लगता है, तो इन आर्थिक समझौतों को लागू करने की गति धीमी हो सकती है.
द्विपक्षीय संबंधों के अलावा, मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है. ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी तनाव के कारण समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा खतरा मंडरा रहा है. भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल और लगभग 60% एलपीजी आयात करता है. होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से भारत का 90% एलपीजी और 69% एलएनजी आयात गुजरता है. इस क्षेत्र में सुरक्षा संकट भारत के व्यापार, प्रेषण (remittances) और वहां रहने वाले लगभग 1 करोड़ भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है. इसलिए, नई इजरायल सरकार ईरान के प्रति क्या रुख अपनाती है, यह भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा.
भारत ने इजरायल के साथ संबंध मजबूत करते हुए हमेशा एक संप्रभु और स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य (टू-स्टेट सॉल्यूशन) का समर्थन किया है. नेतन्याहू ने अभियान के दौरान स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की संभावना को खारिज किया है, जबकि आइसेनकोट ने भी इसे एक "गलती" बताया है.
इजरायल का रुख अरब देशों के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करेगा, जिसका सीधा असर भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) पर पड़ेगा. इसके अलावा, भारत का ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट (जो भारत को मध्य एशिया तक सीधी पहुंच देता है) भी क्षेत्रीय शांति पर निर्भर है. सुरक्षा मोर्चे पर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग (जैसे 2008 मुंबई हमला, 2025 पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर) हमेशा की तरह मजबूत बना रहेगा.