नई दिल्ली: मध्य पूर्व में कई महीनों से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच एक नए समझौते की संभावना चर्चा में है. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार दोनों देशों के बीच ऐसा प्रारूप तैयार किया जा रहा है, जिसमें प्रतिबंधों में राहत, ईरान की जमी हुई संपत्तियों की रिहाई और क्षेत्रीय तनाव कम करने जैसे मुद्दे शामिल हैं. हालांकि इस संभावित समझौते को लेकर बढ़ रही अटकलों के बीच ईरान ने दो टूक कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य और उसके परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मूलभूत अधिकार किसी भी बातचीत का हिस्सा बनकर कमजोर नहीं होंगे.
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए ने कहा है कि मौजूदा मसौदे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन या नियंत्रण से पीछे हटे. एजेंसी के अनुसार इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के भविष्य से जुड़े किसी भी निर्णय पर क्षेत्रीय देशों के बीच बातचीत और साझा सहमति के आधार पर फैसला होगा. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. हाल के महीनों में क्षेत्रीय संघर्षों के कारण यहां समुद्री गतिविधियों पर असर पड़ा था जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी चिंता बढ़ गई थी.
ईरान की मेहर समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के बीच विचाराधीन मसौदे में 60 दिनों की बातचीत की अवधि तय करने का प्रस्ताव है. इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि समझौते के तहत ईरान की लगभग 24 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी किया जा सकता है. बताया गया है कि इस राशि का एक हिस्सा औपचारिक वार्ता शुरू होने से पहले ही उपलब्ध कराया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो यह हाल के वर्षों में ईरान को मिलने वाली सबसे बड़ी आर्थिक राहतों में से एक होगी.
ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यूरेनियम संवर्धन का अधिकार उसके लिए किसी लाल रेखा से कम नहीं है. आईआरएनए के अनुसार तेहरान किसी भी वार्ता में अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत तो करेगा लेकिन देश के मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा. ईरान चाहता है कि यूरेनियम संवर्धन और संवर्धित सामग्री को बनाए रखने के उसके अधिकार को अंतिम समझौते में शामिल किया जाए.
दूसरी ओर अमेरिका लंबे समय से ईरान की परमाणु गतिविधियों पर सीमाएं लगाने की मांग करता रहा है. ऐसे में यही मुद्दा भविष्य की वार्ताओं में सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है. फिलहाल किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन दोनों पक्षों के बीच बढ़ती बातचीत ने कूटनीतिक समाधान की उम्मीद जरूर बढ़ा दी है.