दुनिया की सबसे महंगी किताब, एक पन्ने की कीमत 96 लाख रुपये; आखिर क्यों सबसे अमीर आदमी भी इसे नहीं खरीद सकता

दुनिया में एक ऐसी किताब भी है जिसे विश्व का सबसे अमीर आदमी भी नहीं खरीद सकता है. 'गुटेनबर्ग बाइबिल' की इस वक्त कीमत अरबों में है लेकिन इसे न खरीदने की वजह कुछ और है.

@GujaratHistory
Kuldeep Sharma

कल्पना कीजिए एक ऐसे दौर की जब एक किताब पाने के लिए किसी रईस को अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगानी पड़ती थी. 15वीं शताब्दी से पहले किताबें हाथों से लिखी जाती थीं और एक बाइबिल तैयार करने में सालों लग जाते थे. लेकिन फिर एक शख्स आया जिसने 'मूवेबल टाइप' यानी चलायमान अक्षरों की मशीन बनाई और इतिहास हमेशा के लिए बदल गया. उस शख्स का नाम था जोहान्स गुटेनबर्ग और उनकी बनाई 'गुटेनबर्ग बाइबिल' आज दुनिया की सबसे दुर्लभ और महंगी किताबों में शुमार है.  

आखिर क्यों है यह इतनी खास?

गुटेनबर्ग बाइबिल को '42-लाइन बाइबिल' भी कहा जाता है. इसे 1450 के दशक में जर्मनी के मेंज शहर में छापा गया था. यह वेस्टर्न वर्ल्ड की पहली ऐसी प्रमुख किताब थी जिसे मशीनी तरीके से बड़े पैमाने पर तैयार किया गया था. इससे पहले ज्ञान सिर्फ चर्च और अमीरों की मुट्ठी में था लेकिन गुटेनबर्ग के इस आविष्कार ने किताबों को आम लोगों तक पहुंचाने का रास्ता खोल दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि इस मशीन का आना वैसा ही था जैसे हमारे दौर में इंटरनेट का आना है.  

तकनीक और कला का बेजोड़ संगम

गुटेनबर्ग सिर्फ एक प्रिंटर नही बल्कि एक हुनरमंद सुनार भी थे. उन्होंने अक्षरों को ढालने के लिए सीसा, रांगा और सुरमा जैसी धातुओं का एक खास मिश्रण तैयार किया था जो टिकाऊ भी था और साफ भी. उनकी बनाई स्याही आज भी 570 साल बाद वैसी ही चमकदार दिखती है. दरअसल वह पानी वाली स्याही नहीं बल्कि एक तरह का 'वार्निश' था जिसमें तांबा और सीसा मिला हुआ था ताकि वह मेटल के अक्षरों पर अच्छी तरह चिपक सके.  

दिलचस्प बात यह है कि छपाई के बाद इन किताबों के मार्जिन्स खाली छोड़ दिए जाते थे. खरीदार अपनी पसंद के हिसाब से उन पर सोने और रंगों से हाथ से सजावट करवाते थे. यही वजह है कि आज बची हुई हर गुटेनबर्ग बाइबिल अपने आप में अनोखी है.

अरबों में है इसकी कीमत

अगर आप आज एक पूरी गुटेनबर्ग बाइबिल खरीदना चाहें तो शायद यह नामुमकिन होगा. मूल रूप से छपी 180 कॉपियों में से आज सिर्फ 48 या 49 ही बची हैं जिनमें से केवल 21 ही पूरी स्थिति में हैं. इनमें से ज्यादातर दुनिया के बड़े संग्रहालयों और लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं.

इसकी कीमत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1978 में यह पहली ऐसी किताब बनी थी जिसने नीलामी में 24 लाख डॉलर उस वक्त के हिसाब से करीब 2 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया था. 1987 में इसकी एक अधूरी प्रति 53.9 लाख डॉलर में बिकी थी. आज के बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कोई पूरी कॉपी नीलामी के लिए आती है तो उसकी कीमत 35 मिलियन डॉलर से 50 मिलियन डॉलर तकरीबन 300 से 400 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है.  

एक-एक पन्ने की है भारी डिमांड

1921 में गैब्रियल वेल्स नाम के एक डीलर ने एक अधूरी गुटेनबर्ग बाइबिल के पन्नों को अलग-अलग करके बेचा था जिन्हें 'नोबल फ्रैग्मेंट्स' कहा जाता है. उस समय एक पन्ना 150 डॉलर में बिका था लेकिन आज 2026 के आंकड़ों के मुताबिक एक एक पन्ने की कीमत भी 1 लाख डॉलर तकरीबन 96 लाख रुपये से ऊपर जा चुकी है.  

दूसरे विश्व युद्ध से भी है कनेक्शन

यह किताब सिर्फ अमीरों का शौक नहीं बल्कि युद्ध की 'ट्रॉफी' भी रही है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ की सेना जर्मनी से दो गुटेनबर्ग बाइबिल उठा ले गई थी जो आज भी रूस की लाइब्रेरी में हैं. जर्मनी इन्हें वापस मांगता रहा है लेकिन रूस इन्हें युद्ध के हर्जाने के तौर पर देखता है.

गुटेनबर्ग बाइबिल सिर्फ कागज और स्याही का ढेर नहीं है यह उस क्रांति की गवाह है जिसने इंसान को पढ़ना-लिखना और सोचना सिखाया. इसकी कीमत करोड़ों-अरबों में भले ही हो लेकिन मानव सभ्यता को इसके योगदान की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती. यह आज भी 'किताबों का राजा' बनी हुई है.