चीन ने कर दिया कमाल, 3000 किमी रेगिस्तान को बना दिया हरा भरा जंगल, इस मामले में भारत को मीलों पीछे छोड़ा
चीन ने 46 साल पहले थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट नामक प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी और अब उसका यह प्रोजेक्ट पूरा हो गया है. इसी के साथ चीन का वन्य क्षेत्र 25% हो गया है जो 1949 में मात्र 10% था. वन्य क्षेत्र के मामले में चीन ने भारत को कहीं पीछे छोड़ दिया है.
चीन ने अपने सबसे बड़े रेगिस्तान, ताकलमाकान के चारों ओर 3000 किलोमीटर लंबा एक विशाल ग्रीन बेल्ट बनाने का कार्य पूरा कर लिया है. यह परियोजना देश के राष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य रेगिस्तानकरण को रोकना और गर्मी के मौसम में होने वाली रेत के तूफानों पर नियंत्रण पाना है. यह प्रयास 46 साल पुराने एक अभियान का परिणाम है, जो अब सफलता के साथ संपन्न हुआ है.
46 साल में पूरा हुआ ग्रीन बेल्ट अभियान
चीन के निंगशिया क्षेत्र में स्थित ताकलमाकान रेगिस्तान के चारों ओर 3,000 किलोमीटर लंबी ग्रीन बेल्ट का निर्माण किया गया है. इस परियोजना के तहत पेड़ों की अंतिम 100 मीटर की पंक्ति 31 अगस्त को बोई गई, जिससे ग्रीन बेल्ट का निर्माण पूरा हुआ. इस काम की शुरुआत 1978 में चीन के "थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट" प्रोजेक्ट से हुई थी, जिसे सामान्यत: "ग्रेट ग्रीन वॉल" के नाम से जाना जाता है.
इस परियोजना के अंतर्गत, पूरे चीन में अब तक 30 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में पेड़ लगाए जा चुके हैं, जो लगभग 116,000 वर्ग मील के बराबर है. इस ग्रीन बेल्ट के निर्माण के बाद, शिंजियांग क्षेत्र में भी पेड़ों की कवरिंग 1% से बढ़कर 5% हो गई है, जो पिछले 40 वर्षों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
चीन के वन क्षेत्र में वृद्धि
ग्रीन बेल्ट परियोजना का मुख्य उद्देश्य न केवल रेगिस्तानकरण को रोकना था, बल्कि पूरे देश में वन क्षेत्र को बढ़ाना भी था. 1949 में चीन का कुल वन क्षेत्र लगभग 10% था, जो अब 25% तक पहुंच चुका है. यह वृद्धि पश्चिमी और उत्तरी शिंजियांग जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में पेड़ लगाकर हासिल की गई है. इस प्रयास ने न केवल पर्यावरण को फायदा पहुंचाया है, बल्कि यह परियोजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे रही है, क्योंकि अधिक वृक्षारोपण से रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं. वन्य क्षेत्र के मामले में चीन ने भारत को कहीं पीछे छोड़ दिया है. 2021 तक भारत का वन्य क्षेत्र करीब 21.71% था.
आलोचनाएं और चुनौतियां
हालांकि चीन के ग्रीन बेल्ट प्रयासों को काफी सराहना मिल रही है, लेकिन इसके कुछ आलोचक भी हैं. कई पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस विशाल वृक्षारोपण परियोजना में पेड़ों की जीवित रहने की दर अपेक्षाकृत कम रही है, और यह विशेष रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों में बेहद कठिन है. इसके अलावा, रेत के तूफानों की समस्या भी पूरी तरह से हल नहीं हो पाई है. बीजिंग जैसी जगहों पर रेत के तूफान अभी भी अक्सर होते हैं, जो इस परियोजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करते हैं.
भविष्य की योजनाएं
चीन ने अपनी ग्रीन बेल्ट परियोजना के अगले चरण के रूप में रेगिस्तान के किनारे पर पेड़ और पौधों की नई किस्मों को लगाने की योजना बनाई है. शिंजियांग के एक वन अधिकारी, झू लीडोंग ने बताया कि क्षेत्रीय जल संसाधनों का इस्तेमाल कर वहां के पॉपलर जंगलों का पुनर्निर्माण किया जाएगा. इसके साथ ही, अधिकारियों का लक्ष्य पश्चिमी किनारे पर खेती और बागबानी के लिए नए जंगल नेटवर्क तैयार करना भी है.
चीन में रेगिस्तानकरण की स्थिति
हालांकि चीन की वृक्षारोपण योजना में कई सफलताएं रही हैं, फिर भी 26.8% चीनी भूमि अभी भी रेगिस्तान के रूप में वर्गीकृत की जाती है, जो एक दशक पहले की तुलना में थोड़ा बेहतर है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस सालों में यह आंकड़ा 27.2% से घटा है, लेकिन चीन के सामने अभी भी रेगिस्तानकरण की चुनौती बनी हुई है.