'ये ट्रंप-निर्भरता...', भारत-यूएस ट्रेड डील की खबर पर कांग्रेस का पीएम मोदी पर निशाना

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मोदी सरकार की संचार नीति पर प्रहार किया है. ट्रंप द्वारा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा के बाद रमेश ने इसे 'ट्रंप-निर्भरता' करार देते हुए कहा कि देश को विदेशी सूत्रों से सूचना मिल रही है. 

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Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों की नई इबारत लिखी जा रही है लेकिन देश के भीतर इस पर सियासत गरमा गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई हालिया फोन वार्ता के बाद एक बड़े व्यापार समझौते का ऐलान हुआ है और टैरिफ में कटौती का ऐलान भी किया गया है. हालांकि इस खबर के सार्वजनिक होने के तरीके को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है. रमेश का आरोप है कि सरकार अपनी कूटनीतिक उपलब्धियों की जानकारी साझा करने में विफल रही है.

विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया पर 'स्टे ट्यून्ड' लिखकर मोदी-ट्रंप की बातचीत की पुष्टि की. जयराम रमेश ने सोमवार को इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने एक्स (X) पर लिखा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय पक्ष के बजाय हमें अमेरिकी राजदूत के माध्यम से अपने ही देश के प्रधानमंत्री की वार्ता के बारे में जानकारी मिल रही है.

'ट्रंप-निर्भरता' का नया नारा 

जयराम रमेश ने सरकार की इस संचार प्रणाली पर तंज कसने के लिए एक नया शब्द 'ट्रंप-निर्भरता' (Trump-nirbharta) गढ़ा है. उनका कहना है कि आज भारत की स्थिति ऐसी हो गई है कि हमें अपनी सरकार के कदमों के बारे में जानने के लिए भी राष्ट्रपति ट्रंप या उनके द्वारा नियुक्त अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है. यह टिप्पणी सीधे तौर पर सरकार की पारदर्शिता और सूचना साझा करने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाती है.

कूटनीति और संचार का अभाव 

कांग्रेस नेता का मानना है कि ऐसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौतों के समय सरकार को खुद आगे आकर देश को विश्वास में लेना चाहिए. उनके अनुसार जब ट्रंप जैसे नेता फोन कॉल के बाद तुरंत व्यापारिक सौदे की घोषणा कर देते हैं तो भारतीय विदेश मंत्रालय की चुप्पी खटकती है. यह केवल एक फोन कॉल का मामला नहीं है बल्कि दो रणनीतिक साझेदारों के बीच सूचना के प्रवाह और संतुलन का मुद्दा है.

रणनीतिक संबंधों पर प्रहार 

रमेश की यह आलोचना उस समय आई है जब भारत-अमेरिका के बीच खनिजों और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की चर्चाएं पूर्व में भी हुई हैं. हालांकि जयराम रमेश का ध्यान केवल व्यापार पर नहीं बल्कि इस बात पर है कि देश को जानकारी के लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. उनका तर्क है कि विदेशी मंचों से सूचना का आना राष्ट्रीय गौरव और प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिहाज से चिंता का विषय होना चाहिए.