BRICS 2026

BRICS में शामिल होने को क्यों बेचैन हैं 40 देश? जानिए बढ़ता दायरा दुनिया के लिए वरदान या नई चुनौती

BRICS अब सिर्फ पांच देशों का आर्थिक समूह नहीं रह गया है. मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया के जुड़ने के बाद इसका दायरा काफी बढ़ा है.

Pinterest
Reepu Kumari

नई दिल्ली: भारत की राजधानी दिल्ली में BRICS Summit 2026 को लेकर दुनिया की नजरें टिकी हैं. कभी ब्राजील, रूस, भारत और चीन तक सीमित रहा यह समूह अब कई नए देशों को अपने साथ जोड़ चुका है. दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद BRIC, BRICS बना और हाल के वर्षों में इसका विस्तार और तेज हुआ. आज मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके साथ हैं.

BRICS के बढ़ते प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2023 से 2026 के बीच 40 से ज्यादा देशों ने सदस्य या पार्टनर के तौर पर जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई है. इनमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व के देश शामिल हैं. 2025 26 में पार्टनर कैटेगरी ने उन देशों के लिए भी रास्ता खोला, जो सीधे पूर्ण सदस्यता के बजाय व्यापार, निवेश और परियोजनाओं के जरिए समूह से जुड़ना चाहते हैं.

G7 के सामने नई आर्थिक ताकत बनने की कोशिश

BRICS की शुरुआत उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साझा मंच देने की सोच के साथ हुई थी. इसका उद्देश्य आपसी व्यापार बढ़ाना, निवेश के अवसर मजबूत करना और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को ज्यादा प्रभावी बनाना है. यही वजह है कि BRICS को कई देश पश्चिमी आर्थिक प्रभाव के बीच एक वैकल्पिक मंच के तौर पर देखते हैं.


डॉलर से दूरी की कोशिश क्यों चर्चा में है?

BRICS में डी डॉलराइजेशन भी अहम मुद्दा बन चुका है. इसका मतलब यह नहीं है कि संगठन ने अपनी कोई साझा मुद्रा बना ली है. विचार यह है कि सदस्य देश आपसी व्यापार में जरूरत के अनुसार अपनी अपनी मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ा सकें. इससे डॉलर और अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा सकती है. हालांकि इसके लिए सदस्य देशों के बीच भरोसा और मजबूत आर्थिक सहयोग जरूरी होगा.

40 से ज्यादा देश क्यों देख रहे हैं BRICS की ओर?

कई देशों को लगता है कि BRICS के साथ जुड़ने से उन्हें व्यापार, निवेश और वित्तीय सहयोग के नए रास्ते मिल सकते हैं. विकासशील देशों के लिए यह मंच वैश्विक मुद्दों पर सामूहिक आवाज उठाने का अवसर भी देता है. पार्टनर कैटेगरी आने के बाद पूर्ण सदस्य बने बिना भी सहयोग की संभावनाएं बढ़ी हैं. यही वजह है कि संगठन के साथ जुड़ने में रुचि रखने वाले देशों की संख्या लगातार चर्चा में है.

भारत को इससे क्या फायदा मिल सकता है?

BRICS के विस्तार से भारत को नए बाजारों, व्यापारिक साझेदारियों और कूटनीतिक सहयोग के अवसर मिल सकते हैं. तेल और गैस उत्पादक देशों की भागीदारी से ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं भी बढ़ती हैं. वहीं BRICS का न्यू डेवलपमेंट बैंक सड़क, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता देता है. भारत समेत कई सदस्य देशों के लिए यह विकास परियोजनाओं के वित्तपोषण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है.

बड़ा BRICS, बड़ा फायदा लेकिन चुनौती भी कम नहीं

BRICS जितना बड़ा होगा, भारत के लिए उतने ज्यादा देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करने के अवसर बनेंगे. लेकिन सदस्य देशों की संख्या बढ़ने के साथ उनके हित और प्राथमिकताएं भी अलग अलग होंगी. ऐसे में हर मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा. इसलिए BRICS का विस्तार एक तरफ उसकी ताकत बढ़ा सकता है, तो दूसरी तरफ फैसले लेने और साझा एजेंडा तय करने की चुनौती भी बढ़ा सकता है.