तुर्की हुआ कंगाल, खजाने में अपने ही दोस्त पाकिस्तान ने लगाई आग! भारत के एक कदम से फरफरा रहा दोनों देश
तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही थी, और भारत के साथ बिगड़ते संबंधों ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है. यदि तुर्की ने अपनी विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों में सुधार नहीं किया, तो उसे आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव का सामना करना पड़ सकता है.
कहते हैं संगत से गुण होत है और संगत से गुण जाय है. ये बहुत जरुरी है कि आप किस तरह के लोगों के साथ रहते हैं आपकी दोस्ती किनसे है. खराब संगत आपको बर्बादी की ओर ले जाती है. इस वक्त तुर्की को यह बात अच्छे से समझ आ रही होगी. जिसे वो अपना दोस्त कहता है आज उसी पाकिस्तान की बदौलत वो कंगाल हो गया है. तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले से ही उच्च मुद्रास्फीति, गिरती मुद्रा और राजनीतिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रही थी. अब भारत के साथ बिगड़ते संबंधों और व्यापारिक बहिष्कार ने इस संकट को और गहरा कर दिया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुर्की ने अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो उसे आर्थिक और राजनयिक दोनों ही मोर्चों पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.
भारत-तुर्की संबंधों में गिरावट
भारत ने हाल ही में तुर्की के साथ एक बड़ा डील किया था ये डीस थी $2.3 अरब डॉलर की. इसके तहत जहाज निर्माण करना था. इसे समझौते को भी रद्द कर दिया है. इस निर्णय के पीछे तुर्की द्वारा पाकिस्तान के समर्थन और भारत विरोधी रुख को मुख्य कारण माना जा रहा है. इसके अलावा, भारत में तुर्की के उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार बढ़ रहा है, जिससे तुर्की की कंपनियों को भारतीय बाजार में नुकसान हो रहा है.
आर्थिक संकट और गिरती विकास दर
रॉयटर्स के एक पोल के अनुसार, 2025 की पहली तिमाही में तुर्की की आर्थिक वृद्धि दर 2.3% रहने का अनुमान है, जबकि पूरे वर्ष के लिए यह 3% तक सीमित रह सकती है. यह सरकार के 4% के लक्ष्य से कम है. उच्च ब्याज दरों और मौद्रिक सख्ती के बावजूद, मुद्रास्फीति मार्च 2025 में 38.01% रही, जो अभी भी उच्च स्तर पर है.
राजनयिक और सांस्कृतिक प्रभाव
भारत में तुर्की के खिलाफ लगातार गुस्सा बढ़ता जा रहा है. भारत के लोग हर तरह से अपने देश के साथ है इसलिए तुर्की को हर तरह से झटका दे रहे हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे संस्थानों के तुर्की के साथ सहयोग पर भी संकट मंडरा रहा है. इसके अलावा, तुर्की की कंपनियों को भारत के सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के ठेकों से बाहर किया जा रहा है.
तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही थी, और भारत के साथ बिगड़ते संबंधों ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है. यदि तुर्की ने अपनी विदेश नीति और आर्थिक रणनीतियों में सुधार नहीं किया, तो उसे आर्थिक मंदी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव का सामना करना पड़ सकता है. भारत जैसे तेजी से उभरते बाजार से दूरी बनाना तुर्की के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकता है.
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