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लोकसभा में गिरा महिला आरक्षण बिल, सरकार हासिल नहीं कर सकी दो तिहाई बहुमत

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका. संविधान संशोधन के लिए जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट पक्ष में आए. स्पीकर ओम बिरला ने यह घोषणा की.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
लोकसभा में गिरा महिला आरक्षण बिल, सरकार हासिल नहीं कर सकी दो तिहाई बहुमत
Courtesy: sansad tv

लोकसभा में एक बड़ा झटका लगा है. महिला आरक्षण बिल, जिसे लंबे इंतजार के बाद पेश किया गया था, संसद के इस सत्र में पास नहीं हो सका. चूंकि यह एक संविधान संशोधन विधेयक था, इसलिए इसे पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्यता थी. मगर जब मतदान हुआ तो आंकड़े सरकार के पक्ष में नहीं आए. स्पीकर ओम बिरला ने सदन को बताया कि कुल 528 मतों में से सिर्फ 298 सांसदों ने बिल के समर्थन में वोट दिया, जबकि 230 ने विरोध किया. इस तरह यह विधेयक 54 मतों से गिर गया.

क्यों नहीं मिला दो-तिहाई बहुमत?

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित कराने के लिए कम से कम 352 मतों की जरूरत थी, क्योंकि सदन में कुल 528 सांसदों ने मतदान किया था. लेकिन पक्ष में केवल 298 वोट ही आए. इसका मतलब साफ था – बिल असफल. स्पीकर ओम बिरला ने तुरंत सदन को इसकी जानकारी दी और घोषणा की कि यह विधेयक पारित नहीं हो सका है. यह बिल लोकसभा में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने के लिए लाया गया था, लेकिन राजनीतिक गणित ने साथ नहीं दिया. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई, मगर आखिरी वक्त में आवश्यक संख्या नहीं जुट पाई.

21 घंटे की बहस और तीन बिलों का सिलसिला

गुरुवार और शुक्रवार को मिलाकर इस बिल पर करीब 21 घंटे तक चर्चा चली. करीब 130 सांसदों ने अपने विचार रखे, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल थीं. देर रात तक सदन में हंगामा और तर्क-वितर्क होता रहा. हालांकि, महिला आरक्षण बिल के साथ दो और बिल – परिसीमन संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक – भी पेश किए गए थे. लेकिन जैसे ही मुख्य बिल पास होने में नाकाम रहा, सरकार ने बाकी के दोनों बिल वापस ले लिए.

अब आगे क्या होगा

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिल के गिरने से महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया है. परिसीमन संशोधन विधेयक के तहत लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था, जिसमें राज्यों से 815 और केंद्रशासित प्रदेशों से 35 सीटें होनी थीं. वहीं, केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के कानूनों में बदलाव करता. लेकिन अब सब कुछ रुक गया है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शायद अगले सत्र में सरकार फिर से कोशिश करे, लेकिन तब भी उसे दो-तिहाई बहुमत जुटाना एक बड़ी चुनौती होगी.