लोकसभा में 17 अप्रैल को महिला आरक्षण से जुड़ा अहम संविधान संशोधन बिल पास नहीं हो सका. इस बिल को पास करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत थी. यानी कुल 326 वोट जरूरी थे. लेकिन मतदान के दौरान बिल के पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट दिए हैं. इसी वजह से यह बिल गिर गया और संसद के विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य पूरा नहीं हो सका.
यह बिल महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया था. सरकार चाहती थी कि इसे जल्द लागू किया जाए, लेकिन संख्या का खेल यहां भारी पड़ गया.
कई लोगों को लगता है कि सरकार संयुक्त सत्र बुलाकर इस बिल को पास करा सकती है, लेकिन ऐसा संभव नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त सत्र केवल सामान्य विधेयकों के लिए होता है, जब दोनों सदनों में मतभेद हो. लेकिन यह एक संविधान संशोधन बिल है. अनुच्छेद 368 के अनुसार ऐसे किसी भी बिल को पास करने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अलग अलग विशेष बहुमत जरूरी होता है. इसलिए संयुक्त सत्र का विकल्प यहां पूरी तरह बंद हो जाता है.
यह संशोधन बिल पहले से लागू नारी शक्ति वंदन अधिनियम में बदलाव करने के लिए लाया गया था. मूल कानून के अनुसार महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना पूरी होगी और उसके बाद परिसीमन किया जाएगा. सरकार इस प्रक्रिया को तेज करना चाहती थी ताकि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करके 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिला आरक्षण लागू किया जा सके. लेकिन अब यह बिल पास नहीं हुआ है, इसलिए पुराना नियम ही लागू रहेगा. इसका मतलब यह है कि महिला आरक्षण अब अगली जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया 2034 या उससे आगे तक खिंच सकती है.
बिल गिरने के बाद भी सरकार के पास कुछ रास्ते खुले हुए हैं, लेकिन हर रास्ता आसान नहीं है.
सरकार आने वाले सत्र में इस बिल को फिर से लोकसभा में पेश कर सकती है. इसके लिए पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी होगी.
अगर विपक्ष की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए बिल में कुछ बदलाव किए जाएं, तो इसके पास होने की संभावना बढ़ सकती है.
महिला आरक्षण ऐसा मुद्दा है जिस पर ज्यादातर दल सहमत हैं. लेकिन परिसीमन को लेकर मतभेद हैं. अगर सरकार इन मतभेदों को दूर कर लेती है तो बिल आसानी से पास हो सकता है.
भले ही यह बिल लोकसभा में पास हो जाए, लेकिन राज्यसभा में भी विशेष बहुमत जरूरी होगा. इसलिए वहां भी समर्थन जुटाना जरूरी है.
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार बिना सीट बढ़ाए केवल महिला आरक्षण लागू करने के लिए एक छोटा संशोधन बिल ला सकती है. इससे प्रक्रिया आसान हो सकती है.