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पटना हाई कोर्ट का फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर, अब आरक्षण पर डैमेज कंट्रोल कैसे करेंगे नीतीश कुमार?

आरक्षण पर जिस सियासी दांव से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सबको चित कर दिया था, पटना हाई कोर्ट ने के एक आदेश ने उस पर रोक लगा दी थी. अब उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लग गई है. राज्य में जातिगत जनगणना की वकालत कर रहे नीतीश कुमार, अब कैसे आरक्षण पर नया दांव खेलेंगे, यह देखने वाली बात होगी.

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सुप्रीम कोर्ट से भी ओबीसी, एसटी-एससी समुदायों के लिए तय 65 प्रतिशत अरक्षण वाले प्रावधान पर सुप्रीम कोर बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे लगाने से इनकार कर दिया है. पटना हाई कोर्ट ने 65 प्रतिशत आरक्षण वाले प्रावधान को खारिज करते हुए इसे असंवैधानिक बताया था. सरकार ने शिक्षण संस्थानओं और सरकारी नौकरियों में 65 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए कानून पारित किया था. 

हाई कोर्ट ने आरक्षण के इस फैसले पर मार्च में ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. एक याचिका में इस फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी. अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर बिहार सरकार ने 65 प्रतिशत कर दिया था. राज्य सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ये आरक्षण दिया जाना था. 

किस बेंच ने की है सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट में देश के मुख्य न्यायाधीश DY चंद्रचूड़, जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच ने इस केस की सुनवाई की. सभी, बिहार सरकार की 10 याचिकाओं को की सुनवाई की, जिसमें हाई कोर्ट की रूलिंग को चुनौती दी गई थी.

स्टे मांग रही थी बिहार सरकार, कोर्ट ने कर दिया मना

कोर्ट ने याचिका पर नोटिस देने से इनकार कर दिया लेकिन इस केस को सितंबर तक के लिए टाल दिया है. सीनयिर अधिवक्ता श्याम दीवान ने बिहार सरकार की ओर से मुकदमे की पैरवी की. उन्होंने बेंच से अनुरोध किया कि हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे लगा दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही केस में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले पर हाल ही में स्टे लाया था.

'हम नहीं देंगे फैसले पर स्टे'

CJI चंद्रचूड़ ने कहा, 'हम इस केस को सूचीबद्ध कर देते हैं. हम लेकिन कोई स्टे नहीं देंगे.' बीते महीने पटना हाई कोर्ट ने 65 प्रतिशत आरक्षण वाले फैसले को रद्द कर दिया था. राज्य सरकार ने इस संबंध में दो विधेयक पारित किए थे, जिसमें आरक्षण को 65 प्रतिशत तक बढ़ाने का फैसला सुनाया गया था. बिहार में इसकी वजह से आरक्षण की प्रतिशतता करीब 75 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. यह दर, दूसरे राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा थी. 

अब क्या करेंगे नीतीश कुमार?

सितंबर में अगर सुप्रीम कोर्ट दोबारा इस फैसले पर विचार करता है तो हो सकता है कि आरक्षण जारी रहे लेकिन अभी ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कई पहले सुनाए गए कुछ फैसलों में कहा है कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. बिहार में यह सीमा कहीं ज्यादा है. नीतीश कुमार सरकार के लिए ये फैसला, किसी बड़े झटके की तरह ही है.