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अगर माता-पिता IAS अधिकारी हैं तो उनके बच्चों के लिए आरक्षण क्यों? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, 'यदि माता-पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण से सामाजिक गतिशीलता आती है. इसलिए बच्चों के लिए आरक्षण की मांग करने से कभी भी इस समस्या का हल नहीं निकल पाएगा.'

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
अगर माता-पिता IAS अधिकारी हैं तो उनके बच्चों के लिए आरक्षण क्यों? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
Courtesy: pinterest

सुप्रीम कोर्ट ने आज सवाल किया कि जिन परिवारों ने आरक्षण के जरिए शैक्षिक और आर्थिक उन्नति हासिल कर ली है उनके बच्चों को क्या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण के लाभ मिलते रहने चाहिए, यह देखते हुए कि ऐसी उन्नति से सामाजिक गतिशीलता भी आती है.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, 'यदि माता-पिता दोनों आईएएस अधिकारी हैं तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण से सामाजिक गतिशीलता आती है. इसलिए बच्चों के लिए आरक्षण की मांग करने से कभी भी इस समस्या का हल नहीं निकल पाएगा.'

इस मुद्दे पर ध्यान देना होगा

उन्होंने आगे कहा कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें ध्यान देना होगा. फिर इसका क्या फायदा? आप आरक्षण दे रहे हैं. माता-पिता पढ़े लिखे हैं, अच्छी नौकरी कर रहे हैं, अच्छी आमदनी कमा रहे हैं और फिर बच्चे भी आरक्षण चाहते हैं. उन्हें आरक्षण से बाहर निकालना चाहिए.

न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जवल भुयान की पीठ ने ये टिप्पणियां कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कीं जिसमें याचिकाकर्ता को, जिसके माता-पिता दोनों राज्य सरकार में कर्मचारी हैं, क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण से बाहर रखने के फैसले को बरकरार रखा गया था.

यह मामला कुरुबा समुदाय से संबंधित एक उम्मीदवार से जुड़ा है जिसे कर्नाटक के पिछड़े वर्गों में श्रेणी II(A) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है और जिसे आरक्षित श्रेणी के तहत कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में सहायक अभियंता (विद्युत) के पद पर चुना गया था.

हालांकि, जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने उन्हें जातिगत वैधता प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया क्योंकि वे क्रीमी लेयर से आते थे. उम्मीदवार के परिवार की आय लगभग 19.48 लाख रुपए आंकी गई थी.

अधिकारियों ने पाया कि उम्मीदवार के दोनों माता-पिता सरकारी कर्मचारी थे और उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर सीमा से अधिक थी. सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बार-बार चिंता व्यक्त की कि परिवारों की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के बावजूद आरक्षण के लाभ जारी हैं.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, 'संतुलन होना जरूरी है. सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े होना ठीक है लेकिन अगर माता-पिता आरक्षण का लाभ उठाकर एक स्तर तक पहुंच गए हैं और दोनों आईएएस अधिकारी हैं, सरकारी सेवा में हैं तो उनकी स्थिति बहुत अच्छी होती है. सामाजिक गतिशीलता बनी रहती है. अब वे बहिष्कार पर सवाल उठा रहे हैं. इस बात को भी ध्यान में रखना होगा.'

ये टिप्पणियां वकील शशांक रत्नू के उस बयान के बाद आईं जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकारी कर्मचारियों में उच्च आय का निर्धारण वेतन के आधार पर नहीं किया जाता. उन्होंने कहा कि उच्च आय का निर्धारण माता-पिता  की स्थिति पर निर्भर करता है जैसे कि ग्रुप ए या या ग्रुप बी सेवाओं से संबंधित हैं या नहीं, न कि केवल उनके वेतन पर.

उन्होंने कहा कि यदि वेतन को एकमात्र मानदंड माना जाए तो ड्राइवर, चपरासी, क्लर्क और अन्य निम्न श्रेणी के सरकारी कर्मचारी भी आरक्षण के लाभ से वंचित रह सकते हैं और उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन आय क्रीमी लेयर का निर्णायक कारक नहीं है.

उन्होंने कहा कि वेतन और कृषि से होने वाली आय को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता, केवल व्यवसाय या अन्य स्रोतों से अर्जित आय को ही शामिल किया जा सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि इस मुद्दे पर न्यायिक मत भिन्न-भिन्न हैं और इस पर विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता है.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता के पिता को 53,000 रुपए प्रति माह की बेसिक सेलरी मिलती है जबकि मां को 52,650 रुपए प्रति माह का मूल वेतन मिलता है. उन्होंने कहा कि ये आंकड़े क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित करने के लिए प्रासंगिक नहीं है क्योंकि कर्नाटक सरकार ने स्पष्टीकरण दिया कि जहां माता-पिता राज्य सरकार के कर्मचारी हैं वहां पात्रता का आकलन करते समय वेतन और भत्तों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने तर्क दिया कि यदि क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित  करते समय आय के सभी रूपों को ध्यान में रखा जाएगा तो ओबीसी आरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा.

यह याचिका कर्नाटक उत्तर न्यायालय की एक बेंच के फैसले के विरुद्ध दायर की गई है जिसने उम्मीदवार के पक्ष में सिंगल बेंच के फैसले को पलट दिया था. बेंच ने कहा कि क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए वेतन आय को बाहर रखने का नियम केवल केंद्र सरकार के अंतर्गत आरक्षण पर लागू होता है न कि कर्नाटक में आरक्षण पर.

कर्नाटक की क्रीमी लेयर नीति का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि उम्मीदवार के परिवार की आय लागू सीमा से अधिक थी और वह क्रीमी लेयर के अंतर्गत आता था.