नई दिल्ली: 14 अगस्त 1947 की रात भारतीय इतिहास की सबसे खास रातों में से एक थी. कुछ ही घंटों बाद करीब दो सौ साल के ब्रिटिश शासन का अंत होने वाला था और भारत एक स्वतंत्र देश बनने जा रहा था. दिल्ली में संविधान सभा की बैठक की तैयारियां चल रही थीं, लोग आजादी के स्वागत के लिए उत्साहित थे. लेकिन इसी समय देश के एक दूसरे हिस्से में महात्मा गांधी आजादी के जश्न से दूर सांप्रदायिक हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहे थे.
यह रात इसलिए भी खास थी, क्योंकि भारत को आजादी मिलने के साथ ही देश का विभाजन भी हो रहा था. यानी एक तरफ आजादी की खुशी थी तो दूसरी तरफ बंटवारे और हिंसा का दर्द भी.
14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की विशेष बैठक शुरू हुई. यह वही सभा थी जिसे स्वतंत्र भारत की सत्ता संभालनी थी. बैठक में आजादी के संघर्ष में जान गंवाने वाले लोगों को याद किया गया और उनके सम्मान में मौन रखा गया.
इसके बाद जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसे बाद में 'Tryst with Destiny' के नाम से जाना गया. उन्होंने कहा कि जब दुनिया सो रही होगी, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह की ओर बढ़ेगा.
नेहरू का यह भाषण केवल आजादी की घोषणा नहीं था. इसमें आने वाले भारत की जिम्मेदारियों की भी बात थी. देश को गरीबी, पिछड़ेपन और दूसरी बड़ी चुनौतियों से बाहर निकालना था.
नेहरू के भाषण और उस रात की संविधान सभा की कार्यवाही आज भी भारतीय स्वतंत्रता के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों में गिनी जाती है. नेहरू आर्काइव में 14 अगस्त की आधी रात हुई संविधान सभा की बैठक और उस दौरान नेहरू के भाषण से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध हैं.
जैसे ही आधी रात हुई, भारत स्वतंत्र हो गया. सत्ता का हस्तांतरण हुआ और देश ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होकर अपना नया सफर शुरू किया.
संविधान सभा में स्वतंत्र भारत के लिए शपथ और संकल्प की प्रक्रिया हुई. उस समय मौजूद नेताओं के लिए यह केवल एक राजनीतिक बदलाव नहीं था. यह उन लाखों भारतीयों के संघर्ष का परिणाम था जिन्होंने लंबे समय तक आजादी की लड़ाई लड़ी थी.
इस मौके पर उन लोगों को भी याद किया गया जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेलें झेलीं, यातनाएं सहीं और अपनी जान तक कुर्बान कर दी.
दिल्ली में जब आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, उस समय महात्मा गांधी दिल्ली में नहीं थे. वह कलकत्ता के बेलीघाटा इलाके में स्थित हैदरी मंजिल में रह रहे थे.
कलकत्ता उस समय सांप्रदायिक तनाव और हिंसा से जूझ रहा था. गांधी का मानना था कि देश आजाद हो रहा है, लेकिन अगर लोग एक दूसरे की जान ले रहे हैं तो इस आजादी की खुशी अधूरी है.
गांधी 13 अगस्त 1947 को हैदरी मंजिल पहुंचे थे. उनका उद्देश्य कलकत्ता में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच शांति कायम करना था. गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, 15 अगस्त को उन्होंने उपवास और प्रार्थना के जरिए स्वतंत्रता दिवस बिताया.
14 अगस्त की शाम गांधी ने प्रार्थना सभा में घोषणा की कि वह अगले दिन यानी 15 अगस्त को 24 घंटे का उपवास करेंगे और प्रार्थना तथा चरखा चलाने में समय बिताएंगे.
गांधी के लिए यह दिन केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति का दिन नहीं था. उसी समय भारत का विभाजन भी हो रहा था. इसलिए उन्होंने आजादी की खुशी के साथ देश के बंटवारे और हिंसा के दर्द को भी महसूस किया.
गांधी हेरिटेज पोर्टल के रिकॉर्ड के मुताबिक, 14 अगस्त को गांधी ने कहा था कि अगले दिन भारत ब्रिटिश बंधन से मुक्त होगा, लेकिन आधी रात से हिंदुस्तान दो हिस्सों में बंट जाएगा. उनके लिए इसलिए 15 अगस्त खुशी और शोक दोनों का दिन था.
15 अगस्त की सुबह गांधी ने अपना उपवास शुरू किया. उन्होंने दिन प्रार्थना और लोगों से मुलाकात में बिताया.
आजादी का जश्न मनाने के लिए उनके पास लोगों की भीड़ पहुंच रही थी. लोग उनके दर्शन करने आ रहे थे और उन्हें स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दे रहे थे. लेकिन गांधी का ध्यान लगातार कलकत्ता में शांति बनाए रखने पर था.
गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, 15 अगस्त को उनके पास पूरे दिन बड़ी संख्या में लोग आते रहे. वह इस दिन लंबे उपवास पर थे.
यानी जिस समय दिल्ली में आजादी का उत्सव मनाया जा रहा था, गांधी उसी समय कलकत्ता में लोगों के बीच शांति का संदेश दे रहे थे.
15 अगस्त को लेकर एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि आज जिस तरह प्रधानमंत्री हर साल लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं, 1947 में यह परंपरा उसी दिन शुरू नहीं हुई थी.
15 अगस्त 1947 को दिल्ली का आधिकारिक समारोह प्रिंसेस पार्क, इंडिया गेट के पास हुआ था. जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज 16 अगस्त 1947 को फहराया था.
नेहरू आर्काइव के रिकॉर्ड में 16 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर से नेहरू के भाषण और ध्वजारोहण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. उसी संग्रह में 15 अगस्त के आधिकारिक कार्यक्रम को प्रिंसेस पार्क से जोड़ने वाली टिप्पणी भी दर्ज है.
14 और 15 अगस्त 1947 की रात को केवल आजादी की खुशी के नजरिए से देखना अधूरा होगा.
भारत स्वतंत्र हो रहा था, लेकिन इसी के साथ देश का विभाजन भी हो चुका था. पंजाब और बंगाल समेत कई इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन का दर्द लोगों को झेलना पड़ रहा था.
दिल्ली में नेता स्वतंत्र भारत की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. संविधान सभा में आजादी का संकल्प लिया जा रहा था. दूसरी तरफ गांधी जैसे नेता उन लोगों के बीच थे जो हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित थे.
इसीलिए गांधी ने 15 अगस्त को जश्न मनाने के बजाय उपवास और प्रार्थना का रास्ता चुना.
14 अगस्त की रात भारत के लिए इतिहास बदलने वाली रात थी. संविधान सभा में आजादी की घोषणा की तैयारी हो रही थी. नेहरू स्वतंत्र भारत की पहली सुबह के बारे में देश को बता रहे थे. लाखों भारतीय उस पल का इंतजार कर रहे थे जिसका सपना कई पीढ़ियों ने देखा था.
लेकिन उसी समय गांधी की चिंता कुछ और थी. वह चाहते थे कि आजादी केवल सत्ता परिवर्तन न हो, बल्कि देश के लोगों के बीच शांति और भाईचारा भी कायम हो.