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जब एनिमल लवर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 60 आवारा कुत्तों को मारने का किया था समर्थन, जानें 'अहिंसा के पुजारी' के क्या थे तर्क

अहिंसा के प्रति समर्पित महात्मा गांधी ने मानव जीवन के खतरे में 60 आवारा कुत्तों को मारने की अनुमति दी थी. उन्होंने इसे "संकट में कर्तव्य" माना, न कि अंधाधुंध हिंसा. उनका यह रुख उस समय की करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच के नाज़ुक संतुलन को दर्शाता था.

A.I
Mayank Tiwari

महात्मा गांधी की अहिंसा की शिक्षाएं विश्व विख्यात हैं, जिनमें हिटलर के जर्मनी से लेकर इजरायल के भविष्य तक के विचार शामिल हैं. हालांकि, कम लोग जानते हैं कि गांधीजी ने आवारा कुत्तों के मुद्दे पर भी गहन चिंतन किया था. यह विषय हाल ही में फिर से चर्चा में आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में नागरिक अधिकारियों को आवारा कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी करने और उन्हें आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, महात्मा गांधीजी, जो स्वयं कुत्तों से प्रेम करते थे, उन्होंने लिखा था कि आवारा कुत्तों को भोजन और देखभाल मिलनी चाहिए, लेकिन समाज की सुरक्षा के लिए कुछ कठिन फैसले भी आवश्यक हो सकते हैं.

गांधीजी का अहिंसा और आवारा कुत्तों पर नजरिया

गांधीजी का मानना था कि आवारा कुत्तों को सम्मान और देखभाल मिलनी चाहिए, लेकिन बिना मालिक के या खतरनाक कुत्ते समाज के लिए जोखिम पैदा करते हैं. उन्होंने केवल तभी उनकी हत्या का समर्थन किया जब यह "संकट में कर्तव्य" के रूप में मानव सुरक्षा के लिए जरूरी हो. साल 1926 में, अहमदाबाद के एक मिल मालिक ने गांधीजी से 60 आवारा कुत्तों के बारे में सलाह मांगी, जो रेबीज से ग्रस्त होकर मानव जीवन के लिए खतरा बन गए थे.

गांधीजी ने संतुलित और अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित जवाब दिया. जब उनके सुझाव पर सवाल उठे, तो उन्होंने कहा, "और क्या किया जा सकता था?" अहमदाबाद ह्यूमैनिटेरियन लीग के सवाल पर, गांधीजी ने अपने पत्र यंग इंडिया में इस मुद्दे के नैतिक और सामाजिक निहितार्थों को विस्तार से समझाया.

"आवारा कुत्ते सभ्यता की अज्ञानता दर्शाते हैं"

गांधीजी ने लिखा, "आवारा कुत्ते समाज की सभ्यता या करुणा का प्रतीक नहीं हैं; बल्कि, वे इसके सदस्यों की अज्ञानता और सुस्ती को दर्शाते हैं. उन्होंने कुत्तों को वफादार साथी माना और कहा कि हमें उन्हें अपने साथियों की तरह सम्मान देना चाहिए, न कि सड़कों पर भटकने देना. "कुत्तों को सड़कों पर छोड़ने की प्रथा शर्मनाक है. यदि कोई व्यक्ति कुत्ते की देखभाल नहीं कर सकता, तो उसे किसी संगठन को सहयोग देना चाहिए जो उनकी देखभाल करता हो. यदि यह भी संभव न हो, तो कुत्तों के सवाल पर चिंता छोड़कर अपनी मानवता को अन्य प्राणियों की सेवा में लगाना चाहिए.

अंधाधुंध हत्या नहीं, संकट में कर्तव्य

गांधीजी ने स्पष्ट किया कि वे आवारा कुत्तों की अंधाधुंध हत्या के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने केवल "संकट में कर्तव्य" के रूप में हत्या का समर्थन किया. उन्होंने कहा, "जब राज्य या समाज आवारा कुत्तों की देखभाल नहीं करता, और जब कोई स्वयं उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता, तब, यदि वे समाज के लिए खतरा बनते हैं, तो उन्हें मार देना चाहिए और उन्हें लंबी पीड़ा से मुक्ति देनी चाहिए.

"गांधीजी ने सड़कों पर कुत्तों की "दयनीय स्थिति" के लिए समाज की अहिंसा की गलत समझ को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, "मेरी  मान्यता है कि यह दयनीय स्थिति हमारी अहिंसा की गलत अवधारणा और अहिंसा की कमी के कारण है." उन्होंने चेतावनी दी कि आवारा कुत्तों को अनदेखा करने की नीति अंततः समाज को नसबंदी या हत्या के बीच चयन करने के लिए मजबूर करेगी. मिल मालिक के नैतिक दुविधा पर विचार करते हुए, गांधीजी ने कहा, "यदि वह कुत्ते को मारता है, तो वह पाप करता है.यदि वह नहीं मारता, तो वह बड़ा पाप करता है. इसलिए, वह कम पाप वाला रास्ता चुनता है और बड़े पाप से बचता है. रेबीज से ग्रस्त कुत्ते को मारना न्यूनतम हिंसा है.

सुप्रीम कोर्ट में गांधीजी का उल्लेख

गांधीजी के विचार पहले भी सुप्रीम कोर्ट में सामने आ चुके हैं. 2015 में, कुछ पशुओं की हत्या को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने गांधीजी के हवाले से कहा कि बिना मालिक के जानवर समाज के लिए "खतरा" बन सकते हैं. गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा था, "जब कुत्ते समाज के लिए खतरा बन जाते हैं, तब उनकी हत्या उचित है." उन्होंने कहा, "मैं पालतू कुत्तों से प्यार करता हूं और आवारा कुत्तों को पसंद नहीं करता, जो समाज के लिए खतरा हैं.

"गांधीजी का मानना था कि सच्ची करुणा में जानवरों की देखभाल और समाज के प्रति जिम्मेदारी दोनों शामिल हैं. आवारा कुत्तों को जहां संभव हो, संरक्षित करना चाहिए, लेकिन जब वे वास्तविक खतरा बनें, तो कार्रवाई करना, भले ही वह हत्या हो, एक आवश्यक कर्तव्य है.