वेनेजुएला में कुल कितने भारतीय, अमेरिकी हमले का भारत पर कैसे पड़ेगा असर और क्या संकेत देती है भारत की विदेश नीति?

भारत और वेनेजुएला के बीच संबंध काफी पुराने हैं. दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते साल 1959 से चले आ रहे हैं. इन संबंधों की सबसे मजबूत कड़ी ऊर्जा और तेल सहयोग रहा है.

Anuj

नई दिल्ली: अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. ताजा घटनाक्रम में अमेरिका की सेना ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की है. राजधानी कराकस में तड़के कई तेज धमाके सुने गए, जिससे पूरे शहर में अफरा-तफरी मच गई.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा

इस हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ हिरासत में लेकर देश से बाहर भेज दिया गया है. हमलों के दौरान वेनेजुएला के प्रमुख हवाई अड्डों और बंदरगाहों को निशाना बनाया गया, जिससे देश की परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था पर भी असर पड़ा.

रक्षा मंत्री ने आत्मसमर्पण से इंकार किया

वहीं, वेनेजुएला के रक्षा मंत्री ने आत्मसमर्पण से इनकार करते हुए देश की संप्रभुता की रक्षा करने और विरोध जारी रखने की बात कही है. अमेरिका की इस सैन्य कार्रवाई ने न सिर्फ लैटिन अमेरिका में चिंता बढ़ा दी है, बल्कि वैश्विक कूटनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ने की आशंका है. वेनेजुएला तेल संपन्न देश है और उसके कई देशों के साथ रणनीतिक रिश्ते रहे हैं. ऐसे में यह संकट उन सभी देशों को प्रभावित कर सकता है, जिनके आर्थिक और राजनीतिक हित वेनेजुएला से जुड़े हुए हैं. भारत भी उनमें से एक है.

भारत और वेनेजुएला के बीच राजनयिक रिश्ते

भारत और वेनेजुएला के बीच संबंध काफी पुराने हैं. दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते साल 1959 से चले आ रहे हैं. इन संबंधों की सबसे मजबूत कड़ी ऊर्जा और तेल सहयोग रहा है. वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडार हैं और भारत लंबे समय तक वहां से कच्चा तेल आयात करता रहा है. भारत की सरकारी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड ने वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में निवेश भी किया है, खासतौर पर भारी तेल परियोजनाओं में. हालांकि, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत ने तेल आयात में कमी की, लेकिन ऊर्जा सहयोग पूरी तरह खत्म नहीं हुआ.

भारत पर क्या असर पड़ेेगा?

अगर अमेरिका और वेनेजुएला के बीच संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. वेनेजुएला का तेल अपेक्षाकृत सस्ता माना जाता है. युद्ध की स्थिति में तेल उत्पादन और आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ेंगी. इसका असर भारत के आयात खर्च पर पड़ेगा और भारत को मध्य-पूर्व, रूस और अफ्रीकी देशों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है.

व्यापार और निवेश पर असर

इस संकट का असर व्यापार और निवेश पर भी पड़ सकता है. भारत और वेनेजुएला के बीच व्यापार पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण सीमित हो चुका है. दवाइ, चावल, कृषि उत्पादों और कुछ इंजीनियरिंग सामानों के व्यापार पर असर पड़ सकता है. अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था भी जटिल हो सकती है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए कारोबार करना और मुश्किल हो जाएगा.

भारत की विदेश नीति 

विदेश नीति के मोर्चे पर भारत आमतौर पर संतुलित रुख अपनाता है. अमेरिका-वेनेजुएला टकराव के मामले में भी भारत संप्रभुता के सम्मान, बातचीत के जरिए समाधान और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर जोर दे सकता है. भारत किसी भी देश में बाहरी सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन नहीं करता, लेकिन साथ ही वह अपने आर्थिक हितों और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है. एक्सपर्ट की मानें तो इसलिए भारत न तो खुलकर वेनेजुएला का पक्ष लेगा और न ही सैन्य कार्रवाई का समर्थन करेगा.

भारतीय नागरिकों की संख्या अहम मुद्दा

वेनेजुएला में भारतीय नागरिकों की संख्या भी एक अहम मुद्दा है. अनुमान के अनुसार, वहां करीब तीन से पांच हजार भारतीय और भारतीय मूल के लोग रहते हैं. इनमें से ज्यादातर व्यापारी हैं, जो होटल, रेस्टोरेंट, फार्मा और छोटे उद्योगों से जुड़े हुए हैं. फिलहाल, भारतीयों को लेकर कोई बड़ी आपात स्थिति नहीं है, लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है तो उनकी सुरक्षा भारत सरकार की प्राथमिकता बन जाएगी. जरूरत पड़ने पर भारत सरकार निकासी अभियान की योजना भी बना सकती है, जैसा कि पहले यूक्रेन, सूडान और अफगानिस्तान में किया गया था.

भारत और अमेरिका के रिश्ते

भारत और अमेरिका के रिश्ते रणनीतिक रूप से मजबूत हैं, लेकिन भारत अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने पर जोर देता है. अगर अमेरिका लंबे समय तक वेनेजुएला पर सैन्य दबाव बनाए रखता है, तो भारत सार्वजनिक तौर पर संयम बरतेगा और बातचीत व शांतिपूर्ण समाधान की अपील करेगा. यह संकट भारत के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि इससे उसकी ऊर्जा नीति, विदेशी निवेश, नागरिकों की सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति में भूमिका प्रभावित हो सकती है. आने वाले समय में यह स्थिति भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है.