menu-icon
India Daily

उत्तरी बंगाल में बढ़ा युवाओं का पलायन, बेरोजगारी ने खाली कर दिए पूरे गांव; आखिर क्या है वजह?

उत्तर बंगाल के कई जिलों में बेरोजगारी और उद्योगों की कमी के कारण बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ा है. हर दिन हजारों लोग अपने गांव छोड़ रहे हैं. सिंडिकेट राज, खराब परिवहन और राजनीतिक दबाव उद्योगों के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
उत्तरी बंगाल में बढ़ा युवाओं का पलायन, बेरोजगारी ने खाली कर दिए पूरे गांव; आखिर क्या है वजह?
Courtesy: grok

कोलकाता: उत्तर बंगाल के ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ रहा पलायन अब सामाजिक और आर्थिक संकट बन गया है. मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जैसे जिलों में रोजगार के अवसर न के बराबर हैं, जिसके चलते हजारों युवक रोजाना दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं. उद्योगों का अभाव, सिंडिकेट राज, परिवहन की कमजोरी और राजनीतिक दखल ने स्थिति को और जटिल बना दिया है. चुनावी माहौल में यह मुद्दा एक बड़ी बहस का कारण बन गया है.

बढ़ता पलायन और टूटते सपने

मालदा टाउन स्टेशन इन दिनों उत्तर बंगाल के बदले हालात का आइना बन गया है. हर दिन यहां हजारों युवा नौकरी की तलाश में दूर-दराज के राज्यों के लिए ट्रेन पकड़ते हैं. गांवों में खेत तो हैं, पर काम नहीं; सपने तो हैं, पर साधन नहीं. यही मजबूरी युवाओं को घर से दूर जाने पर मजबूर कर रही है.

उद्योग न होने का संकट

उत्तर बंगाल के आठ जिलों में बड़े उद्योगों का लगभग अभाव है. न तो कोई बड़ा कारखाना, न ही ऐसी व्यवस्था जो रोजगार पैदा कर सके. उद्योग जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि इलाके की भौगोलिक बनावट और कमजोर परिवहन नेटवर्क उत्पादन लागत को कई गुना बढ़ा देता है. अक्सर कच्चा माल दूर से लाना पड़ता है, जिससे उद्योग टिक नहीं पाते और निवेशक हिचकते हैं.

छोटे उद्योगों की सबसे बड़ी बाधा है सिंडिकेट राज

छोटे उद्योग लगाने की कोशिश करने वाले उद्यमियों को स्थानीय स्तर पर भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. जमीन लेने से लेकर निर्माण शुरू होने तक हर कदम पर सिंडिकेट का दबाव रहता है. गिट्टी, सीमेंट, बालू, मजदूर सब कुछ इनकी तय की गई ऊंची कीमत पर ही लेना पड़ता है. कई बार राजनीतिक नेताओं को भुगतान किए बिना जमीन भी नहीं मिलती. ऐसे माहौल में उद्यमी उद्योग लगाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते.

राजनीतिक ठहराव और बढ़ती नाराजगी

स्थानीय लोगों का मानना है कि वर्षों से विकास की गति ठहरी हुई है. बेहतर सड़कें, उद्योग, ट्रेनिंग सेंटर या रोजगार नीति इन सबकी कमी ने युवाओं में नाराजगी भर दी है. विपक्ष का दावा है कि सिंडिकेट और राजनीतिक दबदबा ही विकास को रोक रहा है. चुनाव नजदीक आते ही यह मुद्दा और गर्म हो गया है.

क्या बदल पाएगी राजनीति?

दार्जिलिंग के भाजपा सांसद राजू बिष्ट ने कहा कि डबल इंजन सरकार बनने पर माफिया और सिंडिकेट कल्चर खत्म होगा और उद्योगों का रास्ता खुलेगा. तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया है, पर युवाओं का बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि लोग बदलाव चाहते हैं. सवाल यही है क्या आने वाला समय उत्तर बंगाल के युवाओं को गांव में ही रोजगार देगा?