नई दिल्ली: देश की अर्थव्यवस्था और खेती-किसानी की रीढ़ कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर इस साल अच्छी खबर नहीं आ रही है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अपनी ताजा भविष्यवाणी में स्पष्ट किया है कि इस वर्ष मानसून की बारिश 'सामान्य से कम' रहने की प्रबल संभावना है. विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल कुल वर्षा दीर्घावधि औसत (LPA) का महज 92 प्रतिशत ही रह सकती है. यह खबर उन करोड़ों किसानों के लिए चिंता का सबब बन सकती है, जो अपनी फसलों के लिए पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं.
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन ने एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान इस महत्वपूर्ण जानकारी को साझा किया. उन्होंने बताया कि मौसम के मिजाज में आ रहा यह बदलाव वैश्विक स्तर पर हो रही मौसमी घटनाओं का नतीजा है. विभाग के विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान में 'कमजोर ला नीना' की स्थिति बनी हुई है, जो धीरे-धीरे 'अल नीनो' की ओर बढ़ रही है. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि मानसून के पूरे सीजन के दौरान 'अल नीनो' की स्थितियां बने रहने की संभावना जताई गई है, जो आमतौर पर भारत में बारिश की मात्रा को कम कर देती हैं.
भारतीय मौसम विभाग के मानकों के अनुसार, बारिश के आंकड़ों को समझने के लिए एक विशेष पैमाना तय किया गया है. आईएमडी के मुताबिक, पिछले 50 वर्षों का औसत यानी 87 सेंटीमीटर (35 इंच) को मानक माना जाता है. यदि बारिश इस औसत का 96% से 104% के बीच होती है, तो उसे 'सामान्य' कहा जाता है. लेकिन इस साल अनुमानित 92% बारिश इस श्रेणी से नीचे है, जिसे तकनीकी रूप से 'सामान्य से कम' माना जाता है. जून से सितंबर के चार महीनों के दौरान यह कमी कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की समस्या खड़ी कर सकती है.
मानसून की समयरेखा की बात करें तो विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के अपने नियमित समय के आसपास ही आगे बढ़ने की उम्मीद है. आमतौर पर मानसून दक्षिण राज्य केरल के तट पर 1 जून के आसपास दस्तक देता है. इसके बाद यह पूरे देश को कवर करते हुए आगे बढ़ता है और मध्य सितंबर तक इसकी विदाई यानी वापसी शुरू होती है. हालांकि आगमन का समय समय पर हो सकता है, लेकिन अल नीनो के प्रभाव के कारण बाद के महीनों में बादलों की बेरुखी पूरे सीजन के कुल औसत को बिगाड़ सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के इस कमजोर पूर्वानुमान के बाद अब सरकार और प्रशासन को जल प्रबंधन और कृषि रणनीति पर नए सिरे से काम करने की आवश्यकता होगी, ताकि कम बारिश की स्थिति में भी फसलों को बचाया जा सके.