श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में 1998 के वंधामा हत्याकांड की जांच दोबारा शुरू किए जाने के बाद आतंकवाद के दौर में हुई अन्य हत्याओं और कश्मीरी पंडितों से जुड़े मामलों की भी नए सिरे से जांच की मांग तेज हो गई है. स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) के इस कदम का कश्मीरी पंडित प्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं ने स्वागत किया है.
कश्मीरी पंडित नेता संदीप मावा ने वंधामा मामले को दोबारा खोले जाने का स्वागत करते हुए सवाल उठाया कि घटना के करीब तीन दशक बाद इस मामले को फिर से जांच के दायरे में क्यों लाया गया. उन्होंने कहा कि न्याय किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आतंकवाद के दौर में मारे गए या लापता हुए कश्मीरी मुस्लिम, पंडित और सिख समुदाय के निर्दोष लोगों के मामलों में भी न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
मावा ने कहा कि सभी पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने का अधिकार है और पुराने मामलों की जांच में हुई देरी की भी पड़ताल होनी चाहिए. उन्होंने वंधामा मामले की जांच में तेजी लाने और इसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने की मांग की.
25 जनवरी 1998 को गांदरबल के वंधामा इलाके में कश्मीरी पंडित समुदाय को निशाना बनाकर हमला किया गया था. इस हमले में समुदाय के कई लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बच्चे भी शामिल थे. यह घटना कश्मीर में आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुए प्रमुख हमलों में शामिल रही है.
बीजेपी प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने भी SIA द्वारा वंधामा मामले की जांच दोबारा शुरू किए जाने का स्वागत किया और कहा कि आतंकवाद के दौरान कश्मीरी पंडितों की हत्या से जुड़े सभी मामलों की व्यापक जांच होनी चाहिए और दोषियों को कानून के कटघरे में लाया जाना चाहिए.
ठाकुर ने कहा कि कश्मीरी पंडितों की हत्याओं और नरसंहार से जुड़े मामलों की जांच के लिए लंबे समय से एक व्यापक व्यवस्था की मांग की जाती रही है. उन्होंने बीजेपी नेता टीका लाल टपलू और पूर्व जज जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्याओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय मिलना चाहिए.
ठाकुर ने कहा- 'देर आए, दुरुस्त आए. कम से कम कश्मीरी पंडितों में अब यह उम्मीद जगी है कि उन्हें न्याय मिलेगा.' उन्होंने कहा कि अन्य मामलों को भी दोबारा खोला जाना चाहिए और उनकी जांच पूरी गंभीरता के साथ की जानी चाहिए.
वहीं एक सामाजिक कार्यकर्ता ने वंधामा मामले की जांच दोबारा शुरू किए जाने का स्वागत करते हुए कहा कि जांच केवल उन आतंकियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए जिन्होंने कथित तौर पर वारदात को अंजाम दिया. जांच एजेंसियों को यह भी पता लगाना चाहिए कि आतंकियों को किसी ने पनाह, लॉजिस्टिक सहायता, वर्दी या अन्य किसी तरह की मदद उपलब्ध कराई थी या नहीं.
कार्यकर्ता ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति या नेटवर्क की ओर से हमले के लिए सहायता उपलब्ध कराने की बात सामने आती है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए और दोष साबित होने पर कानून के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए. उन्होंने नादिमर्ग हत्याकांड समेत कश्मीरी पंडितों से जुड़े अन्य मामलों को भी दोबारा जांच के दायरे में लाने की मांग की.
इसके साथ ही कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को हाल में कथित तौर पर दी गई धमकियों को लेकर भी चिंता जताई गई है. इन धमकियों में कथित रूप से आवासीय पते, फोन नंबर और वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर जैसी निजी जानकारियां शामिल थीं.
अल्ताफ ठाकुर ने पुलिस और खुफिया एजेंसियों से इन धमकियों के स्रोत का पता लगाने और यह जांच करने की मांग की कि संबंधित लोगों की निजी जानकारी आरोपियों तक कैसे पहुंची.
ठाकुर ने इसे गंभीर सुरक्षा चिंता बताते हुए कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रहने की जरूरत है. उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसियां कश्मीरी पंडितों के बीच डर पैदा करने और घाटी में उनकी वापसी को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों की जांच के बाद ही हो सकेगी.
संदीप मावा ने इस बीच सभी समुदायों के पीड़ितों के लिए न्याय की मांग दोहराते हुए कहा कि कश्मीर का भविष्य आपसी भाईचारे और साथ मिलकर आगे बढ़ने में है.
उन्होंने कहा कि कश्मीरी मुस्लिम और कश्मीरी पंडित मिलकर कश्मीर का निर्माण करना चाहते हैं. मावा ने आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और दशकों से चले आ रहे हिंसा के चक्र को खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया.
वंधामा मामले की दोबारा जांच शुरू होने से अब आतंकवाद के दौर के कई पुराने और लंबित मामलों पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है. कश्मीरी पंडित प्रतिनिधि जहां समुदाय के खिलाफ हुए हमलों के मामलों में न्याय की मांग कर रहे हैं, वहीं अन्य पक्षों की ओर से भी सभी समुदायों के पीड़ितों के मामलों को समान रूप से जांच के दायरे में लाने की मांग की जा रही है.
अब सबकी नजर SIA की जांच पर है कि क्या करीब तीन दशक पुराने इस मामले में नए सबूत सामने आते हैं, जिम्मेदार लोगों की पहचान होती है और हमले के पीछे मौजूद कथित पूरे नेटवर्क या सहयोगी तंत्र का पता लगाया जा सकता है. पीड़ित परिवारों के लिए वंधामा मामले की दोबारा जांच इस उम्मीद को फिर से जगा रही है कि कश्मीर के हिंसक अतीत से जुड़े कुछ अनसुलझे मामलों को आखिरकार कानूनी निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकेगा.