अंग्रेजों की सेना में ही विद्रोह कराने पहुंच गया था ये भारतीय, 27 साल की उम्र में मिली फांसी
विष्णु गणेश पिंगले ने 1915 में गदर आंदोलन के तहत ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर विद्रोह भड़काने की कोशिश की. मेरठ और अंबाला छावनियों तक पहुंचे, लेकिन गिरफ्तार होकर लाहौर में फांसी दी गई.
भारत की आजादी की कहानी सिर्फ बड़े आंदोलनों, प्रसिद्ध नेताओं और ऐतिहासिक भाषणों की कहानी नहीं है. इसके पीछे ऐसे क्रांतिकारी भी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की सबसे मजबूत दीवार को अंदर से कमजोर करने की कोशिश की. इन्हीं में एक नाम था विष्णु गणेश पिंगले.
पिंगले का लक्ष्य साफ था. अगर ब्रिटिश हुकूमत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना है, तो उसी सेना के भारतीय सैनिकों के बीच आजादी की भावना जगाई जाए. 1915 में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना की छावनियों तक पहुंचकर सैनिकों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के लिए तैयार करने का प्रयास किया. उनका नाम बाद में गदर आंदोलन और लाहौर षड्यंत्र मामले से जुड़ा और आखिरकार अंग्रेजी सरकार ने उन्हें मौत की सजा दे दी.
अमेरिका से भारत लौटे और बदल गया मिशन
विष्णु गणेश पिंगले का जन्म 2 जनवरी 1888 को महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में हुआ था. आगे की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका गए और इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की. अमेरिका में रहते हुए उनका संपर्क उन भारतीयों से हुआ जो विदेश की धरती से ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे.
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इसी दौर में गदर आंदोलन आकार ले रहा था. प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद गदर नेताओं को लगा कि ब्रिटेन युद्ध में उलझा हुआ है और यही भारत में बड़े विद्रोह का अवसर हो सकता है.
गदर आंदोलन की रणनीति केवल जनता को ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़ा करने तक सीमित नहीं थी. उसका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य ब्रिटिश भारतीय सेना के भारतीय जवानों को भी विद्रोह के लिए तैयार करना था. 1915 में इसी उद्देश्य से कई क्रांतिकारी भारत लौटे. पिंगले भी इसी मिशन का हिस्सा बनकर भारत आए.
पिंगले बने बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारियों के बीच कड़ी
भारत लौटने के बाद पिंगले का संपर्क गदर नेताओं के साथ हुआ. उन्होंने रास बिहारी बोस और सचिंद्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर 1915 के प्रस्तावित विद्रोह की तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित 'आजादी का अमृत महोत्सव' की सामग्री के अनुसार, पिंगले और सान्याल अमृतसर पहुंचे और वहां गदर कार्यकर्ताओं के साथ विद्रोह की योजना पर चर्चा की. पिंगले ने बंगाल के क्रांतिकारियों और पंजाब के गदर कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क स्थापित करने में भी भूमिका निभाई. यही वह दौर था जब एक बड़े सैन्य विद्रोह की योजना आकार ले रही थी.
निशाने पर थी ब्रिटिश भारतीय सेना
क्रांतिकारियों की योजना थी कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह करें और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर नियंत्रण स्थापित करें. 1915 के गदर षड्यंत्र का उद्देश्य कई छावनियों में एक साथ विद्रोह की स्थिति पैदा करना था. पंजाब और उत्तर भारत की कई सैन्य छावनियों में सैनिकों से संपर्क साधने की कोशिश की गई. योजना में लाहौर, फिरोजपुर, मेरठ और अन्य सैन्य केंद्रों को महत्वपूर्ण माना गया था.
यह योजना ब्रिटिश सरकार के लिए इसलिए बेहद गंभीर थी क्योंकि 1857 का अनुभव अभी भी औपनिवेशिक शासन की स्मृति में मौजूद था. अगर भारतीय सैनिकों का एक बड़ा हिस्सा हथियारों के साथ विद्रोह में शामिल हो जाता, तो ब्रिटिश शासन के लिए स्थिति बेहद मुश्किल हो सकती थी.
मेरठ और अंबाला की छावनियों में पहुंचे पिंगले
पिंगले की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यहीं से शुरू होता है. वे केवल बैठकर योजना बनाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे. उन्होंने खुद सैन्य छावनियों तक पहुंचने का जोखिम उठाया.
'आजादी का अमृत महोत्सव' में दर्ज जानकारी के अनुसार, पिंगले ने मेरठ और अंबाला की सैन्य छावनियों का दौरा किया और वहां भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया. यानी उनका काम सीधे उस संस्था के भीतर पहुंचना था, जिसके बल पर ब्रिटिश साम्राज्य भारत पर शासन कर रहा था.
यही वजह थी कि ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सेना में असंतोष फैलाने की कोशिश करने वाले खतरनाक क्रांतिकारी के रूप में देखा.
1857 जैसी बगावत की तैयारी
1915 की इस योजना को अक्सर गदर षड्यंत्र या गदर विद्रोह की योजना के रूप में देखा जाता है. क्रांतिकारियों की कोशिश थी कि भारतीय सैनिकों के बीच असंतोष को संगठित विद्रोह में बदला जाए. लक्ष्य केवल एक छावनी नहीं था. योजना कई सैन्य केंद्रों में एक साथ हलचल पैदा करने की थी.
रास बिहारी बोस इस योजना के प्रमुख समन्वयकों में थे. पिंगले, सचिंद्रनाथ सान्याल और करतार सिंह सराभा सहित कई क्रांतिकारी इसके लिए सक्रिय थे. सरकारी स्रोत भी पिंगले को 1915 के गदर विद्रोह के प्रमुख समन्वयकों में शामिल बताते हैं.
लेकिन अंग्रेजों को भनक लग गई
क्रांतिकारियों की योजना जितनी बड़ी थी, ब्रिटिश खुफिया तंत्र भी उतना ही सक्रिय था. विद्रोह के लिए तय तारीख से पहले ही ब्रिटिश प्रशासन को योजना की जानकारी मिलने लगी. सैनिक इकाइयों पर नजर बढ़ाई गई और संदिग्ध गतिविधियों पर कार्रवाई शुरू कर दी गई.
इस तरह जिस सैन्य विद्रोह को एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदलने की उम्मीद थी, वह अपने निर्णायक चरण में पहुंचने से पहले ही कमजोर पड़ गया. गदर योजना के बारे में जानकारी ब्रिटिश प्रशासन तक पहुंचने और कार्रवाई होने के कारण प्रस्तावित विद्रोह व्यापक रूप नहीं ले सका.
पिंगले की गिरफ्तारी और अंग्रेजों का मुकदमा
पिंगले लंबे समय तक पुलिस की नजर से बच नहीं सके. सरकारी ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें 23 मार्च 1915 को गिरफ्तार किया गया. गिरफ्तारी के समय उनके पास विस्फोटक बम भी मिले थे. इसके बाद उन पर ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध छेड़ने और सेना में असंतोष पैदा करने की साजिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए. यह मामला आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से जाना गया.
ब्रिटिश सरकार के लिए मामला सिर्फ बम या किसी एक क्रांतिकारी की गतिविधि का नहीं था. आरोपों का मूल केंद्र यह था कि क्रांतिकारी भारतीय सेना के भीतर विद्रोह पैदा करके ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे थे.
फांसी के फंदे तक पहुंची कहानी
अदालत ने पिंगले को ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध छेड़ने और उससे जुड़े अपराधों में दोषी ठहराया. उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. 16 नवंबर 1915 को विष्णु गणेश पिंगले और करतार सिंह सराभा को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई. पिंगले की उम्र उस समय सिर्फ 27 वर्ष थी. जिस व्यक्ति ने अमेरिका की सुरक्षित जिंदगी छोड़कर भारत लौटना चुना था, वह अंततः ब्रिटिश जेल की कोठरी से फांसी के तख्ते तक पहुंच गया.
पिंगले की कहानी क्यों महत्वपूर्ण है?
विष्णु गणेश पिंगले की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा पक्ष दिखाई देता है जिसे अक्सर सामान्य इतिहास की किताबों में बहुत कम जगह मिलती है. यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ क्रांतिकारियों का लक्ष्य केवल ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना नहीं था. वे ब्रिटिश सत्ता की सैन्य ताकत को ही चुनौती देना चाहते थे. पिंगले ने उस व्यवस्था के भीतर पहुंचने की कोशिश की जिसके हथियारों और सैनिकों के बल पर ब्रिटिश शासन भारत पर कायम था.
1915 की योजना सफल नहीं हुई. ब्रिटिश सरकार ने उसे दबा दिया और कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस प्रयास ने यह जरूर दिखाया कि भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य संरचना को समझते थे और उसके भीतर विद्रोह पैदा करने की गंभीर कोशिश कर रहे थे.
विष्णु गणेश पिंगले का नाम इसलिए याद किया जाना चाहिए कि उन्होंने सिर्फ आजादी का सपना नहीं देखा, बल्कि उस सपने को हासिल करने के लिए ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर तक पहुंचने का जोखिम उठाया. और अंत में, उसी कोशिश की कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई.