नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में कई बार चुनाव जीतने से ज्यादा कठिन होता है हार या किनारे किए जाने के बाद अपनी जगह दोबारा बनाना. विनोद तावड़े की कहानी इसी सियासी धैर्य की मिसाल है. महाराष्ट्र में मंत्री और संगठन के मजबूत नेता रहे तावड़े को 2019 में विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिला. उस समय उनका राजनीतिक भविष्य धुंधला दिखाई दिया. लेकिन उन्होंने सार्वजनिक नाराजगी के बजाय संगठन का रास्ता चुना. कुछ ही वर्षों में यही रणनीति उन्हें दिल्ली की राजनीति के केंद्र तक ले आई. अब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्हें अहम जिम्मेदारी मिली है.
20 जुलाई 1963 को मुंबई के गिरगांव में जन्मे विनोद तावड़े ने साठे कॉलेज से पढ़ाई की. छात्र जीवन में ही वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और संगठन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया. 1988 में वे एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव बने. इसके बाद महाराष्ट्र भाजपा में उनकी संगठनात्मक भूमिका लगातार बढ़ती गई. 1995 में राज्य महासचिव और 1999 में मुंबई भाजपा अध्यक्ष बने. 2002 में विधान परिषद पहुंचे और 2011 में नेता प्रतिपक्ष बने.
2014 का चुनाव तावड़े के लिए बड़ा मोड़ लेकर आया. बोरीवली से जीतकर वे महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचे और देवेंद्र फडणवीस सरकार में स्कूली शिक्षा, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा तथा संस्कृति जैसे विभागों के मंत्री बने. लेकिन 2019 में पार्टी ने उन्हें विधानसभा टिकट नहीं दिया. सत्ता में सक्रिय रहने वाले नेता के लिए यह बड़ा झटका था. इसके बावजूद तावड़े ने सार्वजनिक तौर पर संगठन के खिलाफ मोर्चा नहीं खोला और पार्टी के भीतर अपनी भूमिका जारी रखी.
टिकट कटने के बाद तावड़े को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारी मिली. 2020 में वे भाजपा के राष्ट्रीय सचिव बने और 2021 में राष्ट्रीय महासचिव के पद तक पहुंचे. उन्हें पहले हरियाणा और फिर 2022 में बिहार का प्रभारी बनाया गया. बिहार की जटिल राजनीति में सहयोगियों के साथ तालमेल और संगठन को संभालने की उनकी क्षमता ने केंद्रीय नेतृत्व में उनका कद बढ़ाया. 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने द्रौपदी मुर्मू के समर्थन में संगठनात्मक समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
बिहार में लंबे समय तक संगठन की जिम्मेदारी संभालने के बाद अब तावड़े को उत्तर प्रदेश की चुनावी तैयारी से जोड़ा गया है. 18 अगस्त 2026 को भाजपा ने 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया. उनके साथ जगदीश पटेल को सह-प्रभारी बनाया गया है. इससे पहले तावड़े कई महीनों से यूपी में सक्रिय थे. अब उनके सामने संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को जमीन तक पहुंचाने की चुनौती है.
तावड़े की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि 2019 का झटका उनके लिए अंत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश का रास्ता बन गया. 2026 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्यसभा भी भेजा गया और उन्होंने अप्रैल में सांसद के रूप में शपथ ली. अब यूपी जैसी बड़ी चुनावी जिम्मेदारी उनके संगठनात्मक कौशल की अगली परीक्षा है. भाजपा के लिए भी यह नियुक्ति अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश 2027 के साथ 2029 की राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है.