मई 1996. देश में लोकसभा चुनाव का नतीजा आया तो तस्वीर ऐसी थी, जिसमें किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था. बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, कांग्रेस 140 सीटों पर सिमट गई और बाकी सीटों पर क्षेत्रीय तथा वाम दलों का दबदबा रहा. इसी त्रिशंकु जनादेश ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय शुरू किया, जिसका सबसे चर्चित किरदार बने अटल बिहारी वाजपेयी.
16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि जिस पार्टी के नेता के तौर पर वह प्रधानमंत्री बने थे, उसके पास बहुमत से 111 सीटें कम थीं. आखिर राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें ही सरकार बनाने का मौका क्यों दिया? क्या बीजेपी के पास बहुमत जुटाने की कोई वास्तविक उम्मीद थी? और वह कौन सी राजनीतिक गणित थी, जिसने वाजपेयी सरकार को सिर्फ 13 दिन में संसद के सामने खड़ा कर दिया?
यह कहानी सिर्फ एक सरकार के गिरने की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब भारतीय राजनीति कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से निकलकर गठबंधन युग में प्रवेश कर रही थी.
1996 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ था. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी ने 471 सीटों पर चुनाव लड़कर 161 सीटें जीतीं. कांग्रेस को 140 सीटें मिलीं और जनता दल 46 सीटों के साथ तीसरे बड़े दल के रूप में सामने आया. CPI(M) को 32 सीटें मिलीं.
यानी जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था, लेकिन बीजेपी को भी सरकार चलाने के लिए जरूरी 272 का आंकड़ा नहीं दिया. यहीं से असली राजनीतिक कहानी शुरू होती है.
बीजेपी पहली बार लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. 1984 में जिस बीजेपी के पास सिर्फ दो लोकसभा सीटें थीं, वही पार्टी करीब 12 साल बाद 161 सांसदों के साथ देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी थी. यह बदलाव अपने आप में ऐतिहासिक था. लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होना और बहुमत हासिल करना दो अलग बातें थीं.
त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में राष्ट्रपति के सामने संवैधानिक और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौती थी. किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. ऐसे में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया.
5 मई 1996 को वाजपेयी राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे. उस समय उन्हें अंदाजा था कि सरकार बनाने का निमंत्रण मिलना आसान हिस्सा है, असली चुनौती बहुमत साबित करना होगी. भारतीय एक्सप्रेस की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक वाजपेयी उस मुलाकात को लेकर चिंतित थे, क्योंकि बीजेपी के पास 161 सीटें थीं और बहुमत के लिए 272 सांसदों की जरूरत थी.
16 मई को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. बीजेपी के लिए यह ऐतिहासिक क्षण था, लेकिन इसी के साथ एक ऐसी राजनीतिक दौड़ शुरू हो गई, जिसमें हर दिन सरकार के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण था.
बीजेपी के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था. लेकिन चुनाव के बाद स्थिति पूरी तरह साफ भी नहीं थी. कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी ताकत थी, लेकिन उसने सरकार बनाने का दावा नहीं किया. दूसरी तरफ कई क्षेत्रीय और वाम दल बीजेपी के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की कोशिश में थे. ऐसे में बीजेपी को लगा कि वह छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाकर बहुमत के करीब पहुंच सकती है.
लेकिन दूसरी ओर गैर-बीजेपी दलों में भी तेजी से बातचीत शुरू हो चुकी थी. यही वह दौर था जब भारतीय राजनीति में 'कांग्रेस बनाम बीजेपी' की सीधी लड़ाई के बजाय 'बीजेपी बनाम बाकी दल' जैसी स्थिति बनती दिखाई देने लगी.
1996 के चुनाव में कांग्रेस 140 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर थी. सामान्य राजनीतिक गणित से देखें तो कांग्रेस भी सरकार बनाने की कोशिश कर सकती थी. लेकिन पार्टी चुनाव में बुरी तरह कमजोर हुई थी और पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी. कांग्रेस के सामने एक और विकल्प था. वह खुद सरकार बनाने के बजाय बीजेपी को रोकने के लिए किसी तीसरे मोर्चे को समर्थन दे.
क्षेत्रीय और वाम दलों ने मिलकर यूनाइटेड फ्रंट यानी संयुक्त मोर्चे का रास्ता तैयार किया. कांग्रेस ने इस गठबंधन को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया. यानी जिस कांग्रेस ने दशकों तक देश पर शासन किया था, वह खुद सरकार बनाने के बजाय एक ऐसी सरकार को बाहर से समर्थन देने जा रही थी, जिसमें उसका प्रत्यक्ष हिस्सा नहीं था. भारतीय राजनीति में यह एक बड़ा बदलाव था.
वाजपेयी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उसे 272 के जादुई आंकड़े तक पहुंचना था. लेकिन क्षेत्रीय दलों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के खिलाफ खड़ा था. वाम दल और जनता दल के नेता अलग राजनीतिक विकल्प बनाने में जुटे थे. कांग्रेस भी बीजेपी को समर्थन देने के मूड में नहीं थी.
इसलिए वाजपेयी के सामने एक मुश्किल चुनाव था. क्या वे सांसदों को तोड़कर, नए सहयोगी बनाकर या अलग-अलग दलों से समर्थन लेकर बहुमत जुटाने की कोशिश करें? या फिर उस समय की राजनीतिक वास्तविकता को स्वीकार करें? सरकार के 13 दिनों में बीजेपी बहुमत के लिए जरूरी समर्थन नहीं जुटा सकी.
27 और 28 मई 1996 को लोकसभा में वाजपेयी सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा हुई. संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में इन दोनों दिनों के उनके भाषण और विश्वास प्रस्ताव दर्ज हैं. वाजपेयी जानते थे कि संख्या उनके पक्ष में नहीं है, लेकिन उन्होंने बहुमत जुटाने के लिए सत्ता से चिपके रहने के बजाय संसद के भीतर अपनी बात रखने का रास्ता चुना.
यही वह क्षण था जब भारत की पहली बीजेपी सरकार सिर्फ 13 दिन बाद समाप्त हो गई. रिपोर्टों के अनुसार वाजपेयी ने विश्वास मत का सामना करने के बजाय इस्तीफा देना चुना, क्योंकि सरकार के हारने की संभावना लगभग निश्चित हो चुकी थी.
वाजपेयी के इस्तीफे के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदला. अब बीजेपी को रोकने के लिए तैयार हुआ संयुक्त मोर्चा सरकार बनाने की स्थिति में था. कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. देवगौड़ा को संयुक्त मोर्चे का नेता चुना गया. कांग्रेस ने उनकी सरकार को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया. 1 जून 1996 को एच.डी. देवगौड़ा ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.
इस तरह दो हफ्ते से भी कम समय के भीतर देश में सत्ता का पूरा समीकरण बदल गया.
भारत ने बेहद कम समय में सत्ता के तीन अलग चरण देखे और देश औपचारिक रूप से गठबंधन राजनीति के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका था.
पहली नजर में देखें तो वाजपेयी की पहली सरकार असफल लग सकती है. वह बहुमत साबित नहीं कर पाई और 13 दिन में गिर गई, लेकिन राजनीतिक इतिहास के नजरिए से कहानी इतनी सरल नहीं है.
1996 में बीजेपी पहली बार लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी. यह उस राजनीतिक बदलाव का संकेत था जो आने वाले वर्षों में और मजबूत होने वाला था. भारतीय राजनीति में बीजेपी अब सिर्फ विपक्ष की बड़ी पार्टी नहीं रही थी. वह केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच चुकी थी. वाजपेयी का 13 दिन का कार्यकाल इसी बदलाव का पहला केंद्रीय अध्याय था.
इसके बाद 1998 में बीजेपी फिर सबसे बड़ी ताकतों में रही और वाजपेयी ने गठबंधन के सहारे सरकार बनाई. 1998 की सरकार करीब 13 महीने चली. 1999 के चुनाव के बाद वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए ने स्थिर सरकार बनाई और उन्होंने 1999 से 2004 तक पूर्ण कार्यकाल पूरा किया.
इसलिए 1996 की 13 दिन की सरकार को केवल हार की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा.
वह उस लंबी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत थी, जिसमें बीजेपी ने बहुमत के अभाव से लेकर गठबंधन सरकार और फिर पूर्ण कार्यकाल वाली सरकार तक का सफर तय किया.
1996 की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि वाजपेयी सरकार ने अपनी संख्या बढ़ाने के लिए कितनी राजनीतिक कोशिश की और आखिर कहां जाकर रास्ता बंद हुआ.
उस समय भारतीय राजनीति में सांसदों को अपने पक्ष में करने की चर्चाएं आम थीं. लेकिन वाजपेयी के पास दो विकल्प थे. पहला, किसी भी तरह संख्या जुटाकर सरकार बचाने की कोशिश करना. दूसरा, जब संख्या जुटाना संभव न हो तो इस्तीफा देना. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.
इसी वजह से 13 दिन की सरकार का अंत भारतीय संसदीय राजनीति में एक अलग तरह की मिसाल के रूप में याद किया जाता है.
अगर सफलता का पैमाना सिर्फ सरकार की अवधि और बहुमत साबित करना हो, तो जवाब हां होगा. लेकिन अगर इसे बीजेपी के राष्ट्रीय राजनीतिक विस्तार की कहानी के रूप में देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग है.
1984 में बीजेपी के पास लोकसभा में सिर्फ दो सीटें थीं. 1996 में वह 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी. यह सिर्फ सीटों की संख्या में बदलाव नहीं था. यह भारतीय राजनीति की दिशा बदलने का संकेत था.
1996 के बाद केंद्र की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी, गठबंधन सरकारें सामान्य हुईं और राष्ट्रीय दलों को सत्ता के लिए सहयोगियों की जरूरत समझ में आई. वाजपेयी खुद भी इस बदलाव के केंद्र में रहे.
वाजपेयी की प्रधानमंत्री यात्रा को तीन पड़ावों में समझा जा सकता है.
1996- 13 दिन: बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत नहीं जुटा सकी.
1998- करीब 13 महीने: बीजेपी ने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई, लेकिन एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार एक वोट से हार गई.
1999-2004- पूरा कार्यकाल: बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने अधिक स्थिर गठबंधन बनाया और वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में पूरा कार्यकाल पूरा किया. 1999 की जीत के बाद वाजपेयी स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने जिन्होंने पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया.
इस लिहाज से 1996 की 13 दिन की सरकार अंत नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोग की शुरुआत थी.
आज जब भारतीय राजनीति में गठबंधन, क्षेत्रीय दल, समर्थन पत्र और बहुमत का गणित आम राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा हैं, तब 1996 का घटनाक्रम उस बदलाव का महत्वपूर्ण शुरुआती उदाहरण है.
उस चुनाव ने तीन चीजें स्पष्ट कर दी थीं.
अटल बिहारी वाजपेयी की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली. लेकिन उन 13 दिनों ने भारतीय राजनीति पर कई दशकों तक असर डाला.