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India Daily

पहले 500% फिर 100% और अब 0,  आखिर अमेरिका के दानवीय टैरिफ से कैसे बचा भारत?

अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित टैरिफ फिलहाल रोक दिया है, इससे भारत को बड़ी राहत मिली है, लेकिन भविष्य में शुल्क दोबारा लागू होने की संभावना बनी हुई है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
पहले 500% फिर 100% और अब 0,  आखिर अमेरिका के दानवीय टैरिफ से कैसे बचा भारत?
Courtesy: X

अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित टैरिफ को फिलहाल रोककर भारत जैसे देशों को राहत दी है. शुरुआत में 500 फीसदी तक शुल्क लगाने की चर्चा थी, जिसे बाद में 100 फीसदी तक सीमित किया गया. अब इस व्यवस्था पर अस्थायी रोक के पीछे अमेरिकी हितों, भारत के साथ व्यापार वार्ता और रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े कई पहलुओं की चर्चा हो रही है.

 500 फीसदी टैरिफ लगाने की योजना से हुई शुरुआत

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के दौरान अमेरिका का आरोप रहा है कि रूसी तेल की बिक्री से मिलने वाला पैसा मॉस्को को युद्ध जारी रखने में मदद करता है. इसी वजह से रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बनाने का प्रस्ताव सामने आया.

शुरुआती प्रस्ताव में रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की परिकल्पना की गई थी. इसका मकसद ऐसे देशों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना बेहद महंगा बनाना था, ताकि वे रूस से तेल खरीदना कम कर दें.

500 फीसदी से घटाकर 100 फीसदी करने का प्रस्ताव

जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले विधेयक का समर्थन किया. ग्राहम का तर्क था कि टैरिफ की धमकी देकर भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर रूसी तेल की खरीद कम करने का दबाव बनाया जा सकता है.

बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और अधिकतम टैरिफ का प्रावधान 100 फीसदी तक सीमित कर दिया गया. 18 सितंबर 2026 को ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित ग्राहम अधिनियम ने रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े आयातकों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया. इसमें रूस पर प्रतिबंध बढ़ाने और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाली संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी था.

भारत के लिए क्यों अहम था यह फैसला?

भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है. ऐसे में भारतीय सामानों पर अमेरिका में 100 फीसदी तक टैरिफ लगने की आशंका से भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता था. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता भी प्रभावित होने का खतरा था.

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रहने के कारण टैरिफ का मुद्दा दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है.

17 अक्टूबर को टैरिफ पर अस्थायी रोक

17 अक्टूबर को ट्रंप ने ग्राहम अधिनियम के तहत उपलब्ध छूट के प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए कार्यकारी आदेश जारी किया. इसमें अमेरिकी राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए कानून के तहत प्रतिबंधों, सीमाओं और शुल्कों के लागू होने पर फिलहाल रोक लगाई गई.

इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि कानून समाप्त हो गया है या भविष्य में टैरिफ नहीं लगाया जा सकता. आदेश के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति के पास परिस्थितियों के अनुसार बाद में शुल्क फिर लागू करने का विकल्प बना हुआ है.

क्या भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता है इसकी वजह?

टैरिफ पर रोक के पीछे भारत के साथ जारी व्यापार वार्ता और अमेरिका के आर्थिक हितों को संभावित कारणों के रूप में देखा जा रहा है. चीन के साथ अमेरिका के आर्थिक संबंध भी इस व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं. हालांकि, इन कारणों को टैरिफ रोकने का आधिकारिक आधार नहीं माना जा सकता, जब तक सरकार इसकी स्पष्ट पुष्टि न करे.

इसी तरह, अमेरिका द्वारा रूसी ऊर्जा उत्पादों की खरीद से जुड़ी खबरों को भी इस फैसले के संदर्भ में चर्चा में रखा जा रहा है. लेकिन यह साबित करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होंगे कि इसी वजह से भारत और अन्य देशों को राहत दी गई.

राहत मिली है, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं

अमेरिकी फैसले से फिलहाल भारत जैसे रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ का दबाव कम हुआ है. फिर भी भविष्य में शुल्क दोबारा लागू होने की संभावना बनी हुई है. इसलिए भारतीय निर्यातकों और नीति निर्माताओं के लिए अमेरिका के अगले फैसलों पर नजर रखना जरूरी होगा.