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'दोष साबित होने से पहले जमानत मिलना आरोपी का अधिकार', उमर खालिद मामले पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ का बड़ा बयान

उमर खालिद की जमानत पर चर्चा के दौरान पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि दोषसिद्धि से पहले जमानत नागरिक का अधिकार है. उन्होंने न्यायिक पारदर्शिता, त्वरित सुनवाई और कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार पर भी जोर दिया.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
'दोष साबित होने से पहले जमानत मिलना आरोपी का अधिकार', उमर खालिद मामले पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ का बड़ा बयान
Courtesy: social media

नई दिल्ली: छात्र नेता उमर खालिद की जमानत याचिका नामंजूर होने की पृष्ठभूमि में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का बयान एक बार फिर न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों पर बहस को केंद्र में ले आया है. जयपुर साहित्य महोत्सव में ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र के दौरान उन्होंने कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत देना कानून का सामान्य नियम है. उनका यह वक्तव्य भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में लंबित मामलों और जमानत नीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

दोषसिद्धि से पहले निर्दोषता की धारणा

पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने स्पष्ट कहा कि भारतीय कानून एक मूल प्रकल्पना पर आधारित है, जिसके अनुसार हर आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए. उन्होंने कहा कि जमानत कोई कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है. यदि अदालतें इस सिद्धांत को नजरअंदाज करती हैं, तो न्याय प्रक्रिया का संतुलन बिगड़ता है और व्यक्ति वर्षों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रहता है.

कब जमानत से किया जा सकता है इनकार

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने बताया कि जमानत न देने के केवल तीन वैध आधार हो सकते हैं- आरोपी के दोबारा अपराध करने की आशंका, सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा, या फिर फरार होने की संभावना. उन्होंने कहा कि यदि ये तीनों स्थितियां मौजूद नहीं हैं, तो अदालत को जमानत देनी ही चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मामलों में भी अदालतों को गहराई से जांच करनी चाहिए.

देरी से न्याय पर गहरी चिंता

भारतीय न्याय व्यवस्था में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि त्वरित सुनवाई संविधान का हिस्सा है. यदि सुनवाई में अनावश्यक देरी होती है और कोई ठोस अपवाद नहीं है, तो आरोपी जमानत का हकदार बनता है. उन्होंने निचली अदालतों द्वारा जमानत न दिए जाने को न्याय प्रणाली के लिए चिंताजनक संकेत बताया.

कॉलेजियम व्यवस्था और भरोसे का सवाल

न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली पर बोलते हुए पूर्व CJI ने पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत बताई. उन्होंने सुझाव दिया कि नागरिक संस्थाओं से विशिष्ट और प्रतिष्ठित लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए. इससे न केवल न्यायपालिका में आम जनता का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि निर्णय प्रक्रिया भी अधिक विश्वसनीय बनेगी.

कार्यकाल, आत्ममंथन और अधूरे सुधार

अपने कार्यकाल के अहम फैसलों का जिक्र करते हुए चंद्रचूड़ ने महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन, समलैंगिकता को अपराध से बाहर करना और चुनावी बांड पर फैसले को परिवर्तनकारी बताया. साथ ही उन्होंने माना कि वैवाहिक बलात्कार को अब तक अपराध न बनाना एक बड़ी चूक है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही को भारतीय भाषाओं में प्रसारित करने पर संतोष भी जताया.